उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
विनोद करके बोली–इसमें से मेरे लिए क्या लाओगे बेटा?
रमा ने लिफाफा उसके सामने रखकर कहा–तुम्हारे तो सभी हैं अम्मा। मैं रुपये लेकर क्या करूँगा?
‘घर क्यों नहीं भेज देते। इतने दिन आये हो गये, कुछ भेजा नहीं।’
‘मेरा घर यही है, अम्मा। कोई दूसरा घर नहीं है।’
बुढ़िया का वंचित हृदय गद्गद हो उठा। इस मातृ-भक्ति के लिए कितने दिनों से उसकी आत्मा तड़प रही थी। इस कृपण हृदय में जितना प्रेम संचित हो रहा था, वह सब माता के स्तन में एकत्र होने वाले दूध की भाँति बाहर निकलने के लिए आतुर हो गया।
उसने नोटों को गिनकर कहा–पचास हैं बेटा ! पचास मुझसे और ले लो। चाय का पतीला रक्खा हुआ है। चाय की दूकान खोल दो। यहीं एक तरफ चार-पाँच मोढ़े और एक मेज रख लेना। दो-दो घंटे साँझ-सबेरे बैठ जाओगे तो गुजर भर को मिल जायेगा। हमारे जितने ग्राहक आवेंगे, उनमें से कितने चाय भी पी लेंगे।
देवीदीन बोला–तब चरस के पैसे मैं इस दुकान से लिया करूँगा !
बुढ़िया ने विहँसित और पुलकित नेत्रों से देखकर कहा–कौड़ी-कौड़ी का हिसाब लूँगी। इस फेर में न रहना।
रमा अपने कमरे में गया, तो उसका मन बहुत प्रसन्न था। आज उसे कुछ वही आनन्द मिल रहा था, जो अपने घर भी कभी न मिला था। घर पर जो स्नेह मिलता था, वह उसे मिलना ही चाहिए था। यहां जो स्नेह मिला, वह मानो आकाश से टपका था।
उसने स्नान किया, माथे पर तिलक लगाया और पूजा का स्वाँग करने बैठा कि बुढ़िया आकर बोली–बेटा, तुम्हें रसोई बनाने में बड़ी तकलीफ होती है। मैंने एक ब्राह्मनी ठीक कर दी है। बेचारी बड़ी गरीब है। तुम्हारा भोजन बना दिया करेगी। उसके हाथ का तो तुम खा लोगे? धरम-करम से रहती है बेटा, ऐसी बात नहीं है। मुझसे रुपये-पैसे उधार ले जाती है इसी से राजी हो गयी है।
उन वृद्ध आँखों से प्रगाढ़, अखण्ड मातृत्व झलक रहा था, कितना विशुद्ध, कितना पवित्र। ऊँच-नीच और जाति मर्यादा का विचार आप ही आप मिट गया। बोला–जब तुम मेरी माता हो गयीं तो फिर काहे का छूत-विचार ! मैं तुम्हारे ही हाथ का खाऊँगा।
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