उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
बुढ़िया ने जीभ दाँतों से दबाकर कहा–अरे नहीं बेटा, मैं तुम्हारा धरम न लूँगी, कहाँ तुम बराम्हन और कहाँ हम खटिक। ऐसा कहीं हुआ है।
‘मैं तो तुम्हारी रसोई में खाऊँगा। जब माँ-बाप खटिक हैं, तो बेटा भी खटिक है। जिसकी आत्मा बड़ी हो वही ब्राह्मण है।’
‘और जो तुम्हारे घरवाले सुनें तो क्या कहेंगे !’
‘मुझे किसी के कहने-सुनने की चिन्ता नहीं अम्मा। आदमी पाप से नीच होता है, खाने-पीने से नीच नहीं होता। प्रेम से जो भोजन मिलता है, वह पवित्र होता है। उसे तो देवता भी खाते हैं।’
बुढ़िया के हृदय में भी जाति-गौरव का भाव उदय हुआ। बोली–बेटा, खटिक कोई नीच जात नहीं है। हम लोग बराम्हन के हाथ का भी नहीं खाते। कहार का पानी तक नहीं पीते। मांस-मछली हाथ से नहीं छूते, कोई-कोई सराब पीते हैं, मुदा लुक-छिपकर। इसने किसी को नहीं छोड़ा बेटा। बड़े-बड़े तिलकधारी गटागट पीते हैं। लेकिन मेरी रोटियाँ तुम्हें अच्छी लगेंगी?
रमा ने मुस्कराकर कहा–प्रेम की रोटियों में अमृत रहता है अम्मा, चाहे गेहूँ की हों या बाजरे की।
बुढ़िया यहाँ से चली तो मानो अंचल में आनन्द की निधि भरे हो।
[२८]
जब से रमा चला गया था, रतन को जालपा के विषय में बड़ी चिन्ता हो गयी थी। वह किसी बहाने से उसकी मदद करते रहना चाहती थी। इसके साथ ही यह भी चाहती थी कि जालपा किसी तरह ताड़ने न पाये। अगर कुछ रुपया खर्च करके भी रमा का पता चल सकता, तो वह सहर्ष खर्च कर देती। जालपा की वह रोती हुई आँख देखकर उसका हृदय मसोस उठता था। वह उसे प्रसन्नमुख देखना चाहती थी। अपने अँधेरे, रोने घर से ऊबकर वह जालपा के घर चली जाया करती थी। वहाँ घड़ी भर हँस-बोल लेने से उसका चित्त प्रसन्न हो जाता था। अब वहाँ भी वही मनहूसत छा गयी। यहाँ आकर उसे अनुभव होता था कि मैं भी संसार में हूँ, उस संसार में जहाँ जीवन है, लालसा है, प्रेम है, विनोद है। उसका अपना जीवन तो व्रत की वेदी पर अर्पित हो गया था। वह तन-मन से उस व्रत का पालन करती थी; पर शिव-लिंग के ऊपर रखे हुए घट में क्या वह प्रवाह है, तरंग है, नाद है, जो सरिता में है? वह शिव के मस्तक को शीतल करता रहे, यही उसका काम है, लेकिन क्या उसमें सरिता के प्रवाह और तरंग और नाद का लोप नहीं हो गया है?
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