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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


‘यहाँ के वैद्यों को देख चुकी हूँ, बहन। वैद्य-डाक्टर सबको देख चुकी !’

‘तो कब तक आओगी?’

‘कुछ ठीक नहीं। उनकी बीमारी पर है। एक सप्ताह में आ जाऊँ; महीने-दो महीने लग जायँ, क्या ठीक है; मगर जब तक बीमारी की जड़ न टूट जायेगी, न आऊँगी।’

विधि अन्तरिक्ष में बैठी हँस रही थी। जालपा मन में मुस्करायी। जिस बीमारी की जड़ जवानी में न टूटी, बुढ़ापे में क्या टूटेगी; लेकिन इस सदिच्छा से सहानुभूति न रखना असम्भव था। बोली–ईश्वर चाहेंगे, तो वह वहाँ से जल्द अच्छे होकर लौटेंगे, बहन !

‘तुम भी चलती तो बड़ा आनन्द आता।’

जालपा ने करुण भाव से कहा–क्या चलूँ बहन, जाने भी पाऊँ। यहाँ दिनभर यह आशा लगी रहती है कि कोई खबर मिलेगी। वहाँ मेरा जी और घबड़ाया करेगा।

‘मेरा दिल तो कहता है बाबूजी कलकत्ते में हैं।’

‘तो ज़रा इधर-उधर खोजना। अगर कहीं पता मिले तो मुझे तुरन्त खबर देना।’

‘यह तुम्हारे कहने की बात नहीं है जालपा।’

‘यह मुझे मालूम है। खत तो बराबर भेजती रहोगी?’

‘हाँ अवश्य, रोज़ नहीं तो अँतरे दिन ज़रूर लिखा करूँगी; मगर तुम भी जवाब देना।’

जालपा पान बनाने लगी। रतन उसके मुँह की ओर अपेक्षा के भाव से ताकती रही, मानो कुछ कहना चाहती है और संकोच वश नहीं कह सकती। जालपा ने पान देते समय उसके मन का भाव ताड़कर कहा–क्या है बहन, क्या कर रही हो?

रतन–कुछ नहीं, मेरे पास कुछ रुपये हैं, तुम रख लो। मेरे पास रहेंगे, तो ख़र्च जायेंगे।

जालपा ने मुस्कराकर आपत्ति की–और जो मुझसे ख़र्च हो जायँ?

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