उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
इसमें सन्देह नहीं कि नगर के प्रतिष्ठित और संपन्न घर से रतन का परिचय था; लेकिन जहाँ प्रतिष्ठा थी, वहाँ तकल्लुफ था, दिखावा था, ईर्ष्या थी, निन्दा थी। क्लब के संसर्ग से भी उसे अरुचि हो गयी थी। वहाँ विनोद अवश्य था, क्रीड़ा अवश्य थी; किन्तु पुरुषों के आतुर नेत्र भी थे, विकल हृदय भी, उन्मत्त शब्द भी। जालपा के घर अगर वह शान न थी, वह दौलत न थी, तो वह दिखावा भी न था, वह ईर्ष्या भी न थी। रमा जवान था, रूपवान था, चाहे रसिक भी हो; पर रतन को अभी तक उसके विषय में सन्देह करने का कोई अवसर न मिला था, और जालपा जैसी सुन्दरी के रहते हुए उसकी सम्भावना भी न थी। जीवन के बाजार में और सभी दूकानदारों की कुटिलता और जट्टूपन से तंग आकर उसने इस छोटी सी दूकान का आश्रय लिया था; किन्तु यह दुकान भी टूट गयी।
अब वह जीवन की सामग्रियाँ कहाँ बेसाहेगी, सच्चा माल कहां पावेगी?
एक दिन वह ग्रामोफोन लायी और शाम तक बजाती रही। दूसरे दिन ताजे मेवों की एक टोकरी लाकर रख गयी। जब आती तो कोई सौगात लिये आती। अब तक वह जागेश्वरी से बहुत कम मिलती थी; पर अब बहुधा उसके पास आ बैठती और इधर-उधर की बातें करती। कभी-कभी उसके सिर में तेल डालती और बाल गूँथती। गोपी और विश्वम्भर से भी अब उसे स्नेह हो गया। कभी-कभी दोनों को मोटर पर घुमाने ले जाती। स्कूल से आते ही दोनों उसके बँगले पर पहुँच जाते और कई लड़को के साथ वहाँ खेलते। उनके रोने-चिल्लाने और झगड़ने में रतन को हार्दिक आनन्द प्राप्त होता था। वकील साहब को भी अब रमा के घर वालों से कुछ आत्मीयता हो गयी थी। बार-बार पूछते रहते थे–रमा बाबू का कोई खत आया? कुछ पता लगा? उन लोगों को कोई तकलीफ तो नहीं है?
एक दिन रतन आयी, तो चेहरा उतरा हुआ था। आँखें भारी हो रही थीं। जालपा ने पूछा–आज जी अच्छा नहीं है क्या?
रतन ने कुण्ठित स्वर में कहा–जी तो अच्छा है; पर रात भर जागना पड़ा। रात से उन्हें बड़ा कष्ट है। जाड़ों में उनको दमे का दोरा हो जाता है। बेचारे जाड़ों भर एमलशन और सनाटोजन और न जाने कौन-कौन से रस खाते रहते हैं; पर यह रोग गला नहीं छोड़ता। कलकत्ता में एक नामी वैद्य हैं। अब की उन्हीं से इलाज कराने का इरादा है। कल चली जाऊँगी। मुझे ले तो नहीं जाना चाहते, कहते हैं, वहाँ बहुत कष्ट होगा; लेकिन मेरा जी नहीं मानता। कोई बोलने वाला तो होना चाहिए। वहाँ दो बार हो आयी हूँ, और जब-जब गयी हूँ, बीमार हो गयी हूँ। मुझे वहाँ जरा भी अच्छा नहीं लगता; लेकिन अपने आराम को देखूँ या उनकी बीमारी देखूँ। बहन कभी-कभी ऐसा जी ऊब जाता है कि थोड़ी-सी संखिया खाकर सो रहूँ। विधाता से इतना भी नहीं देखा जाता। अगर कोई मेरा सर्वस्व लेकर भी इन्हें अच्छा कर दे, कि इस बीमारी की जड़ टूट जावे, तो मैं खुशी से दे दूंगी।
जालपा ने सशंक होकर कहा–यहां किसी वैद्य को नहीं बुलाया?
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