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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


रमा–इसीलिए तो जा रहा हूँ। या तो इसी वक्त उसे स्टेशन पर भेजकर आऊँगा, या इस बुरी तरह पेश आऊँगा कि वह भी याद करेगी। ज्यादा बातचीत का मौका नहीं है। रात भर के लिए मुझे इस कैद से आजाद कर दीजिए।

दारोगा–मैं भी चलता हूँ, जरा ठहर जाइए।

रमा–जी नहीं, बिलकुल मामला बिगड़ जायेगा। मैं अभी आता हूँ।

दारोगा लाजवाब हो गये। एक मिनट तक खड़े सोचते रहे, फिर लौट पड़े और ज़ोहरा से बातें करते हुए पुलिस स्टेशन की तरफ चले गये। उधर रमा ने आगे बढ़कर एक ताँगा किया और देवीदीन के घर जा पहुँचा।

जालपा दिनेश के घर से लौटी थी और बैठी जग्गो और देवीदीन से बातें कर रही थी। वह इन दिनों एक ही वक्त खाना खाया करती थी। इतने में रमा ने नीचे से आवाज दी। देवीदीन उसकी आवाज पहचान गया। बोला–भैया हैं सायत।

जालपा–कह दो, यहाँ क्या करने आये हैं। वहीं जायँ।

देवी–नहीं बेटी, ज़रा पूछ तो लूँ क्या कहते हैं। इस बखत उन्हें कैसे छुट्टी मिली?

जालपा–मुझे समझाने आये होंगे और क्या ! मगर मुँह धो रक्खें।

देवीदीन ने द्वार खोल दिया। रमा ने अन्दर आकर कहा–दादा, तुम मुझे यहाँ देखकर इस वक्त ताज्जुब कर रहे होगे। एक घण्टे की छुट्टी लेकर आया हूँ। तुम लोगों से अपने बहुत से अपराधों को क्षमा कराना था। जालपा ऊपर है?

देवीदीन बोला–हाँ, हैं तो। अभी आयी हैं, बैठो, कुछ खाने को लाऊँ !

रमा–नहीं मैं खाना खा चुका हूँ। बस, जालपा से दो बातें करना चाहता हूँ।

देवी–वह मानेंगी नहीं, नाहक शर्मिन्दा होना पड़ेगा। मानने वाली औरत नहीं है।

रमा–मुझसे दो-दो बातें करेंगी या मेरी सूरत ही नहीं देखना चाहतीं? ज़रा जाकर पूछ लो।

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