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ग़बन (उपन्यास)

प्रेमचन्द

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2014
पृष्ठ :544
मुखपृष्ठ : ई-पुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 8444
आईएसबीएन :978-1-61301-157

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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव


ज़ोहरा–मगर कुछ सोच तो लो, नतीजा क्या होगा।

रमा–सब सोच चुका, ज्यादा-से-ज्यादा तीन-चार साल की कैद दरोग़बयानी के जुर्म में। बस अब रुखसत। भूल मत जाना ज़ोहरा, शायद फिर कभी मुलाकात हो।

रमा बरामदे से उतरकर सहन में आया और एक क्षण में फाटक के बाहर था। दरबान ने कहा–हुजूर ने दारोग़ाजी को इत्तला कर दी है?

रमा–कोई ज़रूरत नहीं।

चौकीदार–मैं ज़रा उनसे पूँछ लूँ। मेरी रोजी क्यों ले रहे हैं हुजूर?

रमा ने कोई जवाब न दिया। तेज़ी से सड़क पर चल खड़ा हुआ। ज़ोहरा निस्पन्द खड़ी उसे हसरत-भरी आँखों से देख रही थी। रमा के प्रति ऐसा प्यार, ऐसा विकल करने वाला प्यार उसे कभी न हुआ था। जैसे कोई वीरबाला अपने प्रियतम को समरभूमि की ओर जाते देखकर गर्व से फूली न समाती हो।

चौकीदार ने लपककर दारोग़ा से कहा। यह बेचारे खाना खाकर लेटे ही थे। घबड़ाकर निकले, रमा के पीछे दौडे़ और पुकारा–बाबू साहब जरा सुनिए तो, एक मिनट रुक जाइए, इससे क्या फायदा–कुछ मालूम तो हो, आप कहाँ जा रहे हैं? आखिर बेचारे एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े। रमा ने लौटकर उन्हें उठाया और पूछा–कहीं चोट तो नहीं आयी?

दारोगा–कोई बात न थी, जरा ठोकर खा गया था। आखिर आप इस वक्त कहाँ जा रहे हैं? सोचिए तो इसका नतीजा क्या होगा?

रमा–मैं एक घण्टे में लौट आऊँगा। जालपा को शायद मुखालिफों ने बहकाया है कि तू हाई कोर्ट में एक अर्जी दे दे। जरा उसे जाकर समझाऊँगा।

दारोगा–यह आपको कैसे मालूम हुआ?

रमा–ज़ोहरा कहीं सुन आयी है।

दारोगा–बड़ी बेवफा औरत है। ऐसी औरत का तो सिर काट लेना चाहिए।

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