उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
जालपा कई मिनट तक सड़क पर निस्पन्द-सी खड़ी रही। उन्हें कैसे रोक लूँ ! इस वक्त वह कितने दुखी हैं, कितने निराश हैं ! मेरे सिर पर न जाने क्या शैतान सवार था कि उन्हें बुला न लिया। भविष्य का हाल कौन जानता है। न जाने कब भेंट होगी। विवाहित जीवन के इन दो-ढाई सालों में कभी उसका हृदय अनुराग से इतना प्रकम्पित न हुआ था। विलासिनी रूप में वह केवल प्रेम के आवरण के दर्शन कर सकती थी। आज त्यागिनी बनकर उसने उसका असली रूप देखा, कितना मनोहर, कितना विशुद्ध, कितना विशाल, कितना तेजोमय। विलासिनी ने प्रेमोद्यान की दीवारों को देखा था, वह उसी में खुश थी। त्यागिनी बनकर वह उस उद्यान के भीतर पहुँच गयी थी–कितना रम्य दृश्य था, कितनी सुगन्ध, कितना वैचित्र्य, कितना विकास। इसकी सुगन्ध में, इसकी रम्यता में देवत्व भरा हुआ था। प्रेम अपने उच्चतर स्थान पर पहुँचकर देवत्व से मिल जाता है। जालपा को अब कोई शंका नहीं है, इस प्रेम को पाकर वह जन्म-जन्मान्तरों तक सौभाग्यवती बनी रहेगी। इस प्रेम ने उसे वियोग, परिस्थिति और मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया–उसे अभय प्रदान कर दिया।। इस प्रेम के सामने अब सारा संसार और उसका अखंड वैभव तुच्छ है।
इतने में ज़ोहरा आ गयी। जालपा को पटरी पर खड़े देखकर बोली–वहाँ कैसे खड़ी हो बहन। आज तो मैं न आ सकी। चलो, आज मुझे तुमसे बहुत सी बातें करनी हैं।
दोनों ऊपर चली गयीं।
[४९]
दारोगा को भला कहाँ चैन? रमा के जाने के बाद एक घण्टे तक उसका इंतजार करते रहे, फिर घोड़े पर सवार हुए और देवीदीन के घर जा पहुँचे। वहाँ मालूम हुआ कि रमा को यहाँ से गये आधा घंटे से ऊपर हो गया। फिर थाने लौटे। वहाँ रमा का अब तक पता न था। समझे, देवीदीन ने धोखा दिया। कहीं उन्हें छिपा रक्खा होगा। सरपट साइकिल दौड़ाते हुए फिर देवीदीन के घर पहुँचे और धमकाना शुरू किया। देवीदीन ने कहा–विश्वास न हो, घर की खाना-तलाशी ले लीजिए और क्या कीजिएगा। कोई बहुत बड़ा घर भी तो नहीं है। एक कोठरी नीचे है, एक कोठरी ऊपर।
दारोग़ा ने साइकिल से उतर कर कहा–तुम बतलाते क्यो नहीं, वह कहाँ गये?
देवी–मुझे कुछ मालूम हो तब तो बताऊँ साहब ! यहाँ आये, अपनी घरवाली से तकरार की और चले गये।
दारोग़ा–वह कब इलाहाबाद जा रही हैं?
देवी–इलाहाबाद जाने की तो बाबूजी ने कोई बातचीत नहीं की। जब तक हाई कोर्ट का फैसला न हो जायेगा, वह यहाँ से न जायेंगी।
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