उपन्यास >> ग़बन (उपन्यास) ग़बन (उपन्यास)प्रेमचन्द
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ग़बन का मूल विषय है महिलाओं का पति के जीवन पर प्रभाव
दारोग़ा–मुझे तुम्हारी बातों पर यकीन नहीं आता।
यह कहते हुए दारोग़ा नीचे की कोठरी में घुस गये और हर एक चीज को गौर से देखा। फिर ऊपर चढ़ गये। वहाँ तीन औरतों को देखकर चौंके। ज़ोहरा को शरारत सूझी, तो उसने लम्बा सा घूँघट निकाल लिया और अपने हाथ साड़ी में छिपा लिये। दारोग़ाजी को शक हुआ। शायद हज़रत यह भेष बदले तो नहीं बैठे हैं !
देवीदीन से पूछा–यह तीसरी औरत कौन है?
देवीदीन ने कहा–मैं नहीं जानता। कभी-कभी बहू से मिलने आ जाती हैं।
दारोगा–मुझी से उड़ते हो बचा ! साड़ी पहनाकर मुल्जि़म को छिपाना चाहते हो ! इनमें कौन जालपा देवी हैं? उनसे कह दो नीचे चली जायँ। दूसरी औरत को यहीं रहने दो।
जालपा हट गयी, तो दारोग़ाजी ने ज़ोहरा के पास जाकर कहा–क्यों हज़रत, मुझसे यह चालें ! क्या कह कर वहाँ से आये थे और यहाँ आकर मजे में आ गये। सारा गुस्सा हवा हो गया। अब यह भेष उतारिए और मेरे साथ चलिए, देर हो रही है !
यह कहकर उन्होंने ज़ोहरा का घूँघट उठा दिया। ज़ोहरा ने ठट्ठा मारा। दारोग़ाजी मानो फिसलकर विस्मय-सागर में गिर पड़े। बोले–अरे, तुम हो ज़ोहरा ! तुम यहाँ कहाँ?
ज़ोहरा–अपनी ड्यूटी बजा रही हूँ।
‘और रमानाथ कहाँ गये? तुम्हें तो मालूम ही होगा?’
‘वह तो मेरे यहाँ आने के पहले ही चले गये थे। फिर मैं यहीं बैठ गयी और जालपा देवी से बातें करने लगी।’
‘अच्छा, ज़रा मेरे साथ आओ। उनका पता लगाना है।’
ज़ोहरा ने बनावटी कुतूहल से कहा–क्या अभी तक बँगले पर नहीं पहुँचे?
‘ना ! न जाने कहाँ रह गये !’
रास्ते में दारोगा ने पूछा–जालपा कब तक यहाँ से जायेंगी?
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