क्रांति का देवता चन्द्रशेखर आजाद - जगन्नाथ मिश्रा Kranti Ka Devta : Chandrashekhar Azad - Hindi book by - Jagannath Mishra
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क्रांति का देवता चन्द्रशेखर आजाद

जगन्नाथ मिश्रा


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प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9688
आईएसबीएन :9781613012765

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद की सरल जीवनी


साहब और मेम


सांडर्स की हत्या से एकदम बड़ी सनसनी फैल गई सारे नगर में पुलिस का जाल बिछ गया। जिस सड़क पर, पार्क में, गली-कूंचे में जहां देखो, वहीं पुलिस वाले ही दिखाई पड़ते थे।

डी० ए० वी० कालेज सांडर्स के बंगले के बहुत समीप था। पुलिस को सन्देह हुआ कि उनके अफसर को मारने वाले क्रांतिकारी अवश्य यहीं कहीं छिपे होगे। उन्होंने कालिज को विशेष रूप से घेर लिया और उसका कोना-कोना छान मारा। ढूंढते-ढूंढते थक गए किन्तु कोई चिन्ह तक उनके हाथ न लगा।

लाहौर स्टेशन पर एक साहब अंग्रेजी वेश-भूषा में पूर्णरूप से सुसज्जित, सिर पर फैल्ट हैट लगाये और मुंह को दबाकर धुँआ उड़ाते हुए कार से उतरे। उनके साथ ही भरे-पूरे शरीर वाली, पूर्ण आधुनिकता से सजी हुई उनकी मेम साहिबा भी थीं। पीछे-पीछे फाइलों को बगल में दबाये चपरासी चला आ रहा था।

सांडर्स की हत्या करनेवालों की खोज में पुलिस यहाँ भी काफी संख्या में थी। नगर में आने वाले हर व्यक्ति को पुलिस बड़े ध्यान से देखती थी। कार के आते ही कई पुलिसवाले वहाँ आ गए। उनके अफसर ने साहब को कार से उतरते देखा तो सीधे खड़े होकर 'सैल्यूट' मारा और एक तरफ खडा हो गया।

चपरासी ने टिकट घर से दो प्रथम श्रेणी के और एक नौकरों के दर्जे का टिकट लिया तीनों मेल में सवार होकर अमृतसर चल दिये।

ये बास्तविक साहब मेम व चपरासी नहीं थे। पुलिस की औखों में धूल झोंकने के लिए क्रान्तिकारी ने एक नाटक रचाया था। साहव के भेष में सरदार भगतसिंह थे। उनकी मेम, स्वयं चन्द्रशेखर आजाद बन कर आये थे। चपरासी का अभिनय राजगुरु ने किया।

इस तरह अपने सफल अभिनय द्वारा इन वीरों ने पुलिस को ठगा और अमतसर पहुंच गये। वहां से अलग-अलग गाड़ियों में वैठकर पंजाब की भूमि से सकुशल बहुत दूर निकल गए। पुलिस निराशा से अपने हाथ मलती रह गई।

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