Kranti Ka Devta : Chandrashekhar Azad - Hindi book by - Jagannath Mishra - क्रांति का देवता चन्द्रशेखर आजाद - जगन्नाथ मिश्रा
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जीवनी/आत्मकथा >> क्रांति का देवता चन्द्रशेखर आजाद

क्रांति का देवता चन्द्रशेखर आजाद

जगन्नाथ मिश्रा

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :147
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9688
आईएसबीएन :9781613012765

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद की सरल जीवनी

''उधर गांधी जी का असहयोग आन्दोलन भी ढीला पड़ता चला जा रहा है। क्या तमाशा वना रखा है देश के इन बूढ़े नेताओं ने भी? क्या आजादी भी कोई चीज है? आज हम क्रान्तिकारी लोग भले ही अपनी योजनाओं में सफल नहीं हो सके हैं किन्तु हमारे बलिदानों से भारत के बच्चे-बच्चे में क्रान्ति की भावना जागृत हो चुकी है। वह दिन दूर नहीं है जब भारत की जनता अंग्रेजों को सदैव के लिए इस देश से भगाकर छोड़ेगी।''

''भले ही रामप्रसाद बिस्मिल सरदार भगतसिंह और राजग़ुरु न हों। भारत के नौजवान उनके बलिदानों से प्रेरणा लेंगे। सन् 1857 में क्रूर अंग्रेजों ने मंगल पांडे को सारी सेना के सामने तोप के मुंह से बाँधकर उड़ा दिया था। उन दुष्टों ने समझा था, इससे हमारा आतंक छा जायेगा। किन्तु फल विपरीत ही हुआ। देश में क्रान्ति की जो आग भड़कने वाली थी, वह भड़क उठी। लाखों के भारतवासी आज़ादी के लिए कट मरे। उस समय हिन्दू मुसलमान का कोई भेद-भाव न था। सभी भारतवासी थे। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और तात्याटोपे जैसे वीरों ने दिल्ली के बादशाह बहादुरशाह के नाम पर अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा उठाया था। यदि उस समय निजाम हैदराबाद और महाराजा ग्वालियर सरीखे देशद्रोहियों ने अंग्रेजों की सहायता न की होती तो भारतवासियों की विजय निश्चित थी। सन् 1857 का विद्रोह, विद्रोह न कहलाकर भारत की राज्यक्रान्ति के नाम से विश्व में विख्यात होता! वह अंग्रेजों की विजय नहीं थी, कुछ इने-गिने देशद्रोहियों की गद्दारी की सफलता थी।

इसके बाद महारानी विक्टोरिया के घोपणा-पत्र के शब्द-जालों में आकर भारतीय अपने अधिकारों को कुछ दिनों के लिए भूल-से गए थे। फिर भी पिन्डारी और लुटेरों के रूप में बहुत से लोग अंग्रेजी राज्य के प्रति अपना असंतोष प्रकट करते रहे।

इसमें कोई संदेह नहीं, अंग्रेज बहुत बड़े कूटनीतिज्ञ हैं। सन् 1885 ईसवी में ह्यूम नाम के एक अंग्रेज ने भारतीय काँग्रेस की नींव डाली। उन्होंने सोचा था, अंग्रेजों का विरोध करने वाले पढ़े- लिखे लोग तो कांग्रेस में आ ही जायेंगे। वह सरकार से जो कुछ भी मांगेंगे वह स्पष्ट और लिखित रूप में माँगेंगे। ऐसे सभी लोग हमारी दृष्टि में रहेंगे। हम जब चाहेंगे उन्हे जेल में बन्द कर देंगे। इसके साथ ही, वे हो लोग सशस्त्र विद्रोह करने वालों को भी समझा-बुझाकर शान्त करते रहेंगे। इस तरह हम लोहे से लोहा काटकर अकंटक राज्य करते रहेंगे।

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