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कविता संग्रह >> कामायनी

कामायनी

जयशंकर प्रसाद

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :177
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9700
आईएसबीएन :9781613014295

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देखा उसने, जनता व्याकुल राजद्वार कर रुद्ध रही,
प्रहरी के दल भी झुक आये उनके भाव विशुद्ध नहीं,
नियमन एक झुकाव दबा-सा, टूटे या ऊपर उठ जाय!
प्रजा आज कुछ और सोचती अब तक जो अविरुद्ध रही!

कोलाहल में घिर, छिप बैठे, मनु कुछ सोच विचार भरे,
द्वार बंद लखि प्रजा त्रस्त-सी, कैसे मन फिर धैर्य धरे!
शक्ति-तरंगों में आंदोलन, रुद्ध-क्रोध भीषणतम था,
महानील-मोहित-ज्वाला का नृत्य सभी से उधर परे।

वह विज्ञानमयी अभिलाषा, पंख लगाकर उड़ने की,
जीवन की असीम आशायें कभी न नीचे मुड़ने की,
अधिकारों की सृष्टि और उनकी वह मोहमयी माया,
वर्गों की खाई बन फैली कभी नहीं जो जुड़ने की।

असफल मनु कुछ क्षुब्ध हो उठे, आकस्मिक बाधा कैसी-
समझ न पाये कि यह हुआ क्या, प्रजा जुटी क्यों आ ऐसी!
परित्राण प्रार्थना विकल थी देव-क्रोध से बन विद्रोह,
इड़ा रही जब वहां! स्पष्ट ही वह घटना कुचक्र जैसी।

''द्वार बंद कर दो इनको तो अब न यहां आने देना,
प्रकृति आज उत्पात कर रही, मुझको बस सोने देना!''
कह कर यों मनु प्रकट क्रोध में, किंतु डरे-से थे मन में,
शयन-कक्ष में चले सोचते जीवन का लेना-देना।

श्रद्धा कांप उठी सपने में, सहसा उसकी आंख खुली,
यह क्या देखा मैंने? कैसे वह इतना हो गया छली?
स्वजन-स्नेह में भय की कितनी आशंकायें उठ आतीं,
अब क्या होगा, इसी सोच में व्याकुल रजनी बीत चली।

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