उपन्यास >> नदी के द्वीप नदी के द्वीपसच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय
|
390 पाठक हैं |
व्यक्ति अपने सामाजिक संस्कारों का पुंज भी है, प्रतिबिम्ब भी, पुतला भी; इसी तरह वह अपनी जैविक परम्पराओं का भी प्रतिबिम्ब और पुतला है-'जैविक' सामाजिक के विरोध में नहीं, उससे अधिक पुराने और व्यापक और लम्बे संस्कारों को ध्यान में रखते हुए।
रेखा ने उसका थपकता हाथ पकड़ कर निश्चल कर दिया, और प्रतीक्षा में चुप
पड़ी रही।
“रेखा,
जो कुछ हुआ है, मुझे उसका दुःख नहीं है, परिताप नहीं है। और जो हुआ है
उससे मेरा मतलब केवल अतीत नहीं है, भविष्य भी है - कारण भी, परिणाम भी। और
यह नकारात्मक बात लगती है - मैं कहूँ कि मैं प्रसन्न हूँ , एक आनन्द है
मेरे भीतर-एक शान्ति-भविष्य के प्रति एक स्वागत-भाव...यही मैं तुमसे कहना
चाहता हूँ - वह जो आएगा - आएगा या आएगी, वह तो मुहावरा है - वह मेरा है,
मेरा वांछित है-उससे मैं लजाऊँगा नहीं, वह तुम मुझे दोगी। भूलना मत -
तुम्हें और तुम्हारी देन को मैं वरदान करके लेता हूँ।...” भुवन का स्वर भर
आया, वह चुप हो गया।
रेखा ने बड़ी गहरी साँस ली। भुवन का हाथ
खींचकर अपनी पलकों पर कर लिया, वहीं पकड़े रही। उँगलियों की अतिरिक्त
स्पर्श-संवेदना ने जाना, पलकों के भीतर आँखें हिल रही हैं। थोड़ी देर बाद
अपनी मध्यमा भुवन को कुछ ठण्डी लगी-आँख की कोर पर होने से वह भीग गयी थी।
उसने दूसरा हाथ बढ़ा कर कर्णमूल छुआ, गीला था। हथेली से उसने उसे पोंछ
दिया, कुछ समीप सरक कर बैठ गया।
छत की वह लाल झलक भी बुझ गयी।
वर्षा फिर होने लगी थी। भुवन ने रेखा को और अच्छी तरह ओढ़ा दिया, कुछ
झुककर कोहनी टेककर बहुत हलकी थपकी से रेखा को थपकने लगा।
रेखा सो गयी। थोड़ी देर बाद जागी और कम्बल का आधा हिस्सा खींच कर भुवन पर
कर दिया, उसका हाथ पकड़ लिया और फिर सो गयी...।
भोर
के फीकेपन के साथ बारिश का जोर का एक झोंका आया, तो भुवन जाग गया; उसने
देखा, वह पलंग के एक सिरे पर तीन-चौथाई ओढ़े सोया है, रेखा न मालूम कब
उठकर चली गयी है। उसने बदन ठीक से ढँक लिया, पर एक अजब सूनापन उसमें भरने
लगा...। उसने औंधे होकर तकिया खींच कर आधा छाती के नीचे कर लिया कि उसके
सिरे में मुँह छिपा लेगा - कि सहसा हड़बड़ा कर कोहनी के सहारे उठ बैठा।
तकिये के नीचे कुछ था। टटोल कर देखा-किताब-सी, आँखों के पास लाकर देखा,
पहचान गया - रेखा की कापी।
|