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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर बोले, “अवश्य नहीं पड़ेगी तलवलकर, अवश्य नहीं पड़ेगी।” फिर वह विशेष रूप से भारती को लक्ष्य करके बोले, “लेकिन यह मित्रता नाम की वस्तु संसार में कितनी क्षण भंगुर है भारती। एक दिन जिसके संबंध में सोचा भी नहीं जा सकता, दूसरे ही दिन जरा-सा कारण पैदा हो जाने पर हमेशा के लिए विछोह हो जाता है। यह भी संसार में कोई अस्वाभाविक नहीं है तलवलकर! इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए। मनुष्य बहुत ही दुर्बल प्राणी है। संसार के धक्के संभालने के लिए इसी भावुकता की आवश्यकता पड़ती है।”
इन सब बातों का उत्तर नहीं, प्रतिवाद भी नहीं। सब मौन रहे। लेकिन भारती का चेहरा उदास हो उठा। भारती जानती है कि अकारण कुछ कहना डॉक्टर का स्वभाव नहीं है।
डॉक्टर ने घड़ी देखकर कहा, “मेरा तो जाने का समय हो रहा है भारती! रात की गाड़ी से जा रहा हूं तलवलकर!”
“कहां और किसलिए? अपने आप बताए बिना अनावश्यक कौतूहल प्रकट करने का नियम इन लोगों में नहीं है।”
तलवलकर ने पूछा, “मेरे लिए आपका आदेश?”
डॉक्टर ने हंसकर कहा, “आदेश तो है, लेकिन एक बात है, बर्मा में स्थान का अभाव हो ही जाए तो अपने देश में नहीं होगा, यह निश्चित है। मजदूरों पर जरा नजर रखना।”
तलवलकर ने गर्दन हिलाकर कहा, “अच्छा, फिर कब भेंट होगी?”
डॉक्टर ने कहा, “नीलकांत जोशी के शिष्य हो तुम, फिर यह प्रश्न कैसे कर बैठे?”
तलवलकर चुप हो रहा। डॉक्टर ने कहा, “अब देर मत करो, जाओ। घर पहुंचते-पहुंचते भोर हो जाएगी। और अय्यर, क्या यहीं प्रैक्टिस करने का निश्यच कर लिया है?”
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