|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
कृष्ण अय्यर ने सिर हिलाकर सम्मति प्रकट की। किराए की गाड़ी बाहर खड़ी प्रतीक्षा कर रही थी। दोनों बाहर जाने लगे तो तलवलकर ने कहा, “अंधेरे में अपूर्व बाबू कहां चले गए। भेंट नहीं हुई....”
लेकिन इस बात का उत्तर देना किसी ने आवश्यक नहीं समझा। कुछ ही देर बाद गाड़ी की आवाज से मालूम हो गया कि वह लोग चले गए।
“तुम क्या समझती हो....अपूर्व चला गया?” डॉक्टर ने कहा।
भारती बोली, “नहीं सम्भव है आस-पास खोजने से मिल जाएंगे। आपसे बिना भेंट किए वह नहीं जाएंगे।”
डॉक्टर बोले, “तुम यही काम करो। अधिक नहीं ठहर सकता बहिन!”
“नहीं। वह इसी बीच आ जाएंगे,” यह कहकर दरवाजे के बाहर भारती ने नजरें दौड़ाई और परिचित पैरों की आवाज की प्रतीक्षा में बेचैन हो उठी। जी चाहा दौड़कर कहीं आप-पास से उसे पलभर में खोज लाए। लेकिन इतनी व्याकुलता दिखाने में उसे आज लज्जा मालूम हुई। डॉक्टर ने घड़ी की ओर देखा। भारती ने घड़ी पर नजर डाली। पांच-छ: मिनट से अधिक समय नहीं था।
“आप क्या पैदल ही जाएंगे?”
“नहीं। दो बजकर बीस मिनट पर बड़ी सड़क से एक घोड़ा गाड़ी गुजरेगी। छ:-सात आने में स्टेशन पहुंचा देगी।”
“पैसा न देने पर भी पहुंचा देगी। लेकिन जाने से पहले क्या सुमित्रा जीजी को देखने नहीं जाएंगे? वह सचमुच बीमार हैं।”
डॉक्टर ने कहा, “मैंने कब कहा कि बीमार नहीं हैं? लेकिन डॉक्टर को दिखाए बिना बीमारी कैसे अच्छी होगी?”
|
|||||

i 








