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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भयंकर आकृति वाला आदमी गरजकर बोला, “डेथ।”
भारती चुप थी।
रामदास बोला, “सव्यसाची ही डॉक्टर बने हैं। यह समाचार उन्हें मिल चुका है। अपूर्व बाबू ने यह बात बता देने में कसर नहीं रखी है। होटल के कमरे में ही उन्हें पकड़ा जा सकता है। इसके पहले मैं राजनीतिक अपराध में दो वर्ष जेल काट चुका हूं, यह भी बता दिया।”
सुमित्रा ने कहा, “भारती, तुम जानती हो कि डॉक्टर पकड़े जाएंगे तो उसका परिणाम क्या होगा? फांसी हो जाएगी। अगर उससे बच भी गए तो 'ट्रांसोप्रोट्रेशन'। सभासदगण, आप लोग इस अपराध का दंड क्या निश्चित करते हैं?”
सभी एक साथ बोल उठे-”डेथ।”
“भारती, तुम्हें कुछ कहना है?”
भारती ने सिर हिलाकर बताया-”कुछ नहीं।”
वह भयंकर आदमी बोला, “यह भार मैं अपने ऊपर लेता हूं।”
कृष्ण अय्यर ने दरवाजे की ओर देखकर हीरा सिंह से कहा, “बगीचे के कोने में एक सूखा कुआं है। कुछ अधिक मिट्टी डालकर और फिर उसके ऊपर थोड़ी सूखी पत्तियां डाल देनी चाहिए। गंध न निकलने पाए।”
हीरा सिंह बोला, “इस काम में कमी न होगी।”
तलवलकर बोला, “अब बाबू साहब को बुलाकर सजा सुना देनी चाहिए।”
अपूर्व के अपराध का विचार पांच मिनट में ही समाप्त हो गया। विचार करने वालों की राय जितनी संक्षिप्त थी उतनी ही स्पष्ट भी। समझ में न आने योग्य कोई जटिलता नहीं थी।
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