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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


भारती जल्दी से डॉक्टर के पास जा बैठी। उसके कंधो पर बायां हाथ रखकर डॉक्टर ने जैसे चुपचाप उसे ढाढ़स बंधाया। हीरा सिंह अंदर नहीं आया। दरवाजे के पास ही खड़ा रहा। भारती ने चारों ओर नजर डाली। जो लोग बैठे थे उनमें से पांच-छ: को तो वह बिल्कुल ही नहीं पहचानती थी। परिचितों में से डॉक्टर और सुमित्रा के अतिरिक्त रामदास तलवलकर और कृष्ण अय्यर थे।

अपरिचितों पर नजर डालते ही सबसे पहले उसकी नजर एक भयानक चेहरे वाले आदमी पर पड़ी। वह गेरुए रंग का लम्बा चोला पहने था। सिर पर बहुत बड़ी पगड़ी थी। उसका मुंह बड़ी हांड़ी की तरह गोलाकार और शरीर गैंडे के समान स्थूल, मांसल और सूखा था। बड़ी-बड़ी आंखों के ऊपर भौंहों का चिन्ह तक नहीं। कड़ी-कड़ी सींकों की तरह खड़ी मूंछें शायद दूर से गिनी जा सकती थीं। रंग तांबे जैसा। उसे देखते ही स्पष्ट मालूम हो जाता था कि वह अनार्य मंगोलिया जाति का है। उस वीभत्स भयानक आदमी की ओर भारती आंख उठाकर नहीं देख सकी। दो मिनट तक समूचे कमरे में सन्नाटा छाया रहा। फिर सुमित्रा ने पुकारकर कहा, “भारती, मैं तुम्हारे मन की बात जानती हूं? इसलिए मेरी इच्छा नहीं थी कि तुम्हें यहां बुलाकर दु:खी करूं। लेकिन डॉक्टर ने ऐसा नहीं करने दिया। जानती हो, अपूर्व बाबू ने क्या किया है।”

भारती मौन देखती रह गई।

सुमित्रा बोली, “वोथा कम्पनी ने रामदास को बर्खास्त कर दिया है। अपूर्व की भी वही दशा होती। लेकिन कमिश्नर के सामने हम लोगों की सारी बातें सच-सच कह देने से ही उसकी नौकरी बच गई। वेतन कम नहीं था। पांच-छह सौ के लगभग होगा।”

रामदास बोला, “हां।”

सुमित्रा बोली, 'पथ के दावेदार' विद्रोहियों का दल है और हम लोग छिपाकर रिवाल्वर रखते हैं - यह सारी बातें भी उन्होंने बता दीं। इसके लिए क्या दण्ड है भारती?”

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