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उपन्यास >> पथ के दावेदार

पथ के दावेदार

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :537
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9710
आईएसबीएन :9781613014288

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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।


ऑफिस की छुट्टी के बाद आज अपूर्व पैदल घर जाने का साहस न कर सकेगा। यह सोचकर इन लोगों ने किराए की गाड़ी हीरा सिंह की सहायता से ऑफिस के पास खड़ी कर दी। इस फंदे में अपूर्व ने सहज ही पांव रख दिए। कुछ देर चलाकर गाड़ीवान ने कहा एक भारी रोलर के टूट जाने के कारण गली का मोड़ बंद हो गया है। घूमकर जाना होगा। अपूर्व ने स्वीकार किया और उसके बाद अन्यमनस्क-सा हो गए। लेकिन घण्टे भर बाद जब उसे होश हुआ तो देखा, हीरा सिंह गाड़ी में पिस्तौल लिए खड़ा है।

सुमित्रा ने पुकारकर कहा, “अपूर्व बाबू, हम लोगों ने आपको प्राण-दंड दिया है। आपको कुछ कहना है?”

अपूर्व ने सिर हिलाकर कहा, “नहीं।”

डॉक्टर ने पूछा, “हीरा सिंह तुम्हारी पिस्तौल कहां है?

हीरासिंह ने सुमित्रा की ओर इशारा किया।

डॉक्टर ने हाथ बढ़ाकर कहा, “पिस्तौल देखूं तो सुमित्रा?”

सुमित्रा ने बेल्ट से पिस्तौल खोलकर डॉक्टर के हाथ में दे दी।

डॉक्टर ने पूछा, “और किसी के पास रिवाल्वर है?”

और किसी के पास नहीं है - यह बात सबने बता दी। तब सुमित्रा की पिस्तौल अपनी जेब में रखकर डॉक्टर ने हल्की-सी मुस्कराहट के साथ कहा, “तुमने कहा, तुम लोगों ने प्राण-दंड दिया है। लेकिन भारती ने नहीं दिया।”

सुमित्रा ने भारती की ओर देखकर कहा, “भारती नहीं दे सकती।”

डॉक्टर ने कहा, “दे पाना उचित नहीं है। क्यों भारती?”

भारती चुप रही। इस कठिनतम प्रश्न के उत्तर में उसने औंधी लेटकर डॉक्टर की गोद में अपना मुंह छिपा लिया।

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