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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने उसके सिर पर एक हाथ रखकर कहा, “अपूर्व बाबू ने जो कुछ कर डाला है, वह लौट नहीं सकता। उसका परिणाम हम लोगों को भोगना ही पड़ेगा। दंड देने पर भी और न देने पर भी भोगना पड़ेगा। इसलिए इसकी आवश्यकता नहीं। भारती इनका भार अपने ऊपर ले ले।”
सुमित्रा ने कहा, “नहीं।”
सभी एक साथ बोल उठे, “नहीं।”
वह भयानक आदमी सबसे अधिक उछला। उसने अपने दोनों पंजे उठाकर भारती की ओर इशारा करके कोई बात कही।
सुमित्रा ने कहा, “हम सबका मत एक ही है। इतने बड़े अन्याय को प्रश्रय देने से हम लोगों का सारा काम टूट-फूटकर समाप्त हो जाएगा?”
डॉक्टर ने कहा, “अगर समाप्त हो जाए तो उसका उपाय ही क्या है?”
सुमित्रा के साथ ही पांच-सात आदमी गरज उठे, “उपाय क्या है? देश के लिए, स्वाधीनता के लिए हम लोग और कोई बात नहीं मानेंगे। आपके अकेले की बात से कुछ नहीं हो सकता।”
लोगों को गरजना बंद हो जाने पर डॉक्टर ने उत्तर दिया। इस बार उनकी आवाज आश्यर्चजनक रूप से शांत और नर्म सुनाई दी। उसमें रत्ती भर भी उत्साह और उत्तेजना नहीं थी। उन्होंने कहा-”सुमित्रा, विद्रोह को प्रश्रय मत दो। तुम लोग जानते हो कि मेरे अकेले का मत तुम एक सौ आदमियों से भी अधिक कठोर है।”
फिर उस भयंकर मनुष्य को सम्बोधित करके बोले, “ब्रजेन्द्र बटाविया में एक बार तुमने मुझे दंड देने के लिए विवश किया था, अब दूसरी बार विवश मत करो।”
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