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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
रामदास बोला, “ऐसा हो सकता है, मैंने सोचा भी नहीं था।”
डॉक्टर बोले, “मित्रता नामक वस्तु कितनी क्षणभंगुर है, इस बात को भी तुमने कभी सोचा था तलवलकर? ऐसा सत्य संसार में दुर्लभ ही है।”
कृष्ण अय्यर ने कहा, “तुम लोगों की बर्मा की एक्टिविटी समाप्त हो गई। अब भाग जाना पड़ेगा।”
डॉक्टर बोला, “पड़ेगा ही। लेकिन समय को देखते हुए स्थान छोड़ देना और एक्टिविटी छोड़ देना एक चीज नहीं है अय्यर। अगर बहुत दिन तक किसी स्थान पर निश्चिंत भाव से रहने को जगह न मिले तो उसके लिए शिकायत करना हम लोगों को शोभा नहीं देता।” यह कहकर वह भारती को इशारा करके उठ खड़े हुए और बोले, “हीरा सिंह, अपूर्व बाबू के बंधन खोल दो। चलो भारती तुम लोगों को किसी निरापद स्थान पर पहुंचा दूं।”
हीरा सिंह आदेश पालन करने के लिए बढ़ा तो सुमित्रा ने कठोर स्वर में कहा, “अभिनय के अंतिम अंक में तालियां बजाने को जी चाहता है। लेकिन यह कोई बात नहीं है। बचपन में शायद कहीं किसी उपन्यास में पढ़ी थी। लेकिन यह युगल मिलन हम लोगों के सामने हो जाता तो और कहीं कोई कमी न रह जाती। क्या कहती हो भारती?”
भारती लज्जा से मानो मर जाने की स्थिति में हो गई। डॉक्टर ने कहा, “लज्जित होने की तो इसमें कोई बात है नहीं भारती। बल्कि मैं चाहता हूं कि अभिनय समाप्त करने के जो मालिक हैं वह किसी दिन इसमें जरा-सी कमी न रखें।” फिर जेब से सुमित्रा की पिस्तौल निकालकर उसके पास रखकर बोले, “मैं इन लोगों को पहुंचाने जा रहा हूं। लेकिन भय की कोई बात नहीं है। मेरे पास पिस्तौल और भी है।”
डॉक्टर ने कनखियों से ब्रजेन्द्र की ओर देखकर हंसते हुए कहा, “तुम लोग जो मजाक में कहा करते थे कि मैं उल्लू की तरह अंधेरे में भी देख लेता हूं, इस बात को तुम लोग आज भूल मत जाना।”
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