|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
यह कहकर वह अपूर्व को साथ लेकर बाहर जाने के लिए तैयार हो गए।
सहसा सुमित्रा खड़ी होकर बोली, “क्या फांसी की डोरी अपने ही हाथ से अपने गले में डाले बिना काम नहीं चल सकता?”
डॉक्टर ने हंसते हुए कहा, “एक साधारण डोरी से डरने से कैसे काम चलेगा सुमित्रा?”
किसी काम को हाथ में लेने से पहले मनुष्य को मृत्यु का भय दिखाना कितना अर्थहीन है। यह याद करके सुमित्रा स्वयं ही लज्जित हो गई। बोली, “सब कुछ तितर-बितर हो गया। लेकिन फिर कब भेंट होगी?”
डॉक्टर ने कहा, “कोई आवश्यकता पड़ने पर ही होगी।”
“वह आवश्यकता कभी पड़ेगी।”
“जरूर पडेग़ी” यह कहकर अपूर्व और भारती को साथ लेकर वह सावधानी से नीचे उतर गए।
जो गाड़ी भारती को लेकर आई थी अभी तक खड़ी थी। गाड़ीवान को जगाकर उसमें तीनों बैठकर चल पड़े।
बहुत देर की खामोशी भंग करके भारती ने पूछा, “भैया, हम लोग कहां जा रहे हैं?”
“अपूर्व के घर” डॉक्टर ने उत्तर दिया।
लेकिन दो मील चलने के बाद जब गाड़ी रुकवा कर डॉक्टर उतरने लगे तो भारती ने आश्चर्य से पूछा, “यहां क्यों?”
डॉक्टर ने कहा, “अब लौटूंगा। वह लोग प्रतिक्षा कर रहे होंगे, कुछ-न-कुछ निर्णय तो हो ही जाना चाहिए।”
|
|||||

i 








