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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
लेकिन इतनी बड़ी बात वह जैसे एकदम भूल ही गया है। उसने अपने घनिष्ट मित्र तलवलकर के प्रति, अपने दल के प्रति और विशेष रूप से उस डॉक्टर के प्रति कैसा जघन्य अपराध किया है, यह बात उसे याद ही नहीं है। चिंता है तो केवल बड़ी नौकरी और हाथों के दाग की।
जब भारती को सामने वाली खुली खिड़की से भोर का उजाला दिखाई दिया तो उसने चुपचाप द्वार खोला और तेजी से पैर बढ़ाकर सड़क पर पहुंच गई।
अगले दिन तीसरे पहर सभी बातों और सारी घटनाओं का विस्तार से एक-एक कर वर्णन कर चुकने के बाद अंत में भारती ने कहा-”अपूर्व बाबू महान पुरुष हैं, ऐसा समझने की भूल मैंने कभी नहीं की लेकिन यह भी नहीं सोचा था कि वह इतने साधारण और तुच्छ आदमी हैं।”
डॉक्टर सव्यसाची उसकी ओर देखकर गम्भीर स्वर में बोले, “लेकिन मैं जानता था। वह इतना तुच्छ न होता तो क्या तुम्हारे इस अथाह प्रेम को इतने तुच्छ कारण से छोड़कर चला जाता? जाने दो। जान बच गई बहिन।”
इधर-उधर बिखरी चीजों, विशेष रूप से फर्श पर बिखरी पड़ी पुस्तकों के ढेर देखने से ही यह बात समझ में आ जाती है कि कुछ देर पहले पुलिस इस कमरे की तलाशी ले चुकी है। उन सबको संवारकर रखती हुई भारती बातचीत कर रही थी। अपने हाथ का काम बंद करके आश्चर्य से आंखें उठाकर बोली, “तुम हंसी कर रहे हो भैया?”
“नहीं तो?”
“जरूर कर रहे हो।”
डॉक्टर बोले, “मुझ जैसे आदमी से, जो बम-पिस्तौल लिए लोगों की हत्या करता फिरे, ऐसे मजाक की आशा करती हो?”
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