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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने धीरे-धीरे कहा, “तब तक हाथ के दाग मिट जाएंगे।”
उसके मुंह से इससे अधिक बात नहीं निकली। अपूर्व के सिर पर जो हाथ अब चलना नहीं चाहता था। इस अत्यंत साधारण और तुच्छ व्यक्ति को वह मन-ही-मन प्यार करने लगी है, इस बात को अनुभव करके वह अपने आप ही लाज के मारे मर सी गई। यह बात उसके दल के बहुत से लोग जान गए हैं। आज अपूर्व की जान बचाने जाकर वह उन सबके सामने अपराधिनी और सुमित्रा की नजरों में छोटी हो गई है। लेकिन इस अत्यंत तुच्छ व्यक्ति की हत्या करने की नीचता - और ओछेपन से वह उन लोगों को बचा सकी है - इस बात को मानकर उसे गर्व का अनुभव भी हुआ।
अपूर्व बोला, “दाग तो सहज में जाएगा नहीं। कोई पूछेगा तो क्या उत्तर दूंगा? इसीलिए तो लोग कहा करते हैं कि बंगालियों के लड़के बी.ए.-एम.ए. पास तो कर लेते हैं लेकिन बड़ी नौकरी नहीं संभाल सकते।
“अच्छा, अब सो जाइए” यह कहकर भारती उठ खड़ी हुई।
“माथे पर थोड़ी देर और हाथ फेर दो भारती।”
“नहीं, मैं बहुत थक गई हूं।”
“तो रहने दो, रात भी अब बाकी नहीं रही।”
भारती पास की कोठरी में डेक चेयर पर जा बैठी। अपूर्व के कमरे में अच्छी आराम कुर्सी थी। लेकिन उस तुच्छ आदमी की उपस्थिति में एक ही कमरे में रात बिताने में आज उसे अत्यंत लज्जा महसूस हुई। उसे खयाल आया कि किस तरह और कितनी अगाध करुणा से अपूर्व सुनिश्चित और आसन्न मृत्यु से मुक्ति पा गया है।
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