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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
देश से प्यार करने का यही पुरस्कार है भारती। यदि इससे अधिक का दावा करना हो तो वह परलोक में ही हो सकता है। इतनी भयंकर परीक्षा तुम क्यों देने जाओगी बहिन! मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि अपूर्व के साथ सुख से रहो। मैं निश्चित रूप से जानता हूं कि अपनी समस्त दुविधाओं और संस्कारों को दबाकर किसी दिन वह तुम्हारे मूल्य को अवश्य जान जाएगा।”
भारती की आंखें आंसुओं से भर उठीं। कुछ देर चुपचाप मुंह झुकाए रहकर उसने पूछा, “क्या तुम मुझ पर विश्वास न कर पाने के कारण किसी तरह मुझे विदाकर देना चाहते हो भैया?”
उसके इस सरल और संकोच रहित प्रश्न का कोई ऐसा ही सीधा-सा उत्तर शायद डॉक्टर के होंठों पर नहीं आया। हंसकर बोले, “तुम्हारी तरह ममता, माया कोई सहज में छोड़ सकता है बहिन? लेकिन कल तुम अपनी आंखों से ही तो देख चुकी हो कि इसमें कितनी चोरी-छिपा या कितनी हिंसा और कितना भीषण क्रोध भरा हुआ है। तुम्हारी ओर देखने से लगता है कि तुम इन कार्यों के लिए नहीं हो। तुम्हें इसमें खींच लाना उचित नहीं हुआ। तुमसे काम लेने का एक दिन है - वह दिन जिस दिन मेरे लिए छुट्टी लेने का परवाना आएगा।”
इस बार भारती अपने आंसुओं को न रोक सकी। लेकिन फौरन हाथ से पोंछकर बोली, “तुम भी अब इन लोगों के साथ मत रहो भैया।”
उसकी बात सुनकर डॉक्टर हंस पड़े, बोले, “इस बार बहुत ही मूर्खता की बात हो गई भारती।”
भारती ने विचलित हुए बिना कहा, “मैं जानती हूं। लेकिन यह सभी लोग बहुत ही भयंकर और निष्ठुर हैं।”
“और मैं?”
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