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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
“तुम भी बड़े निर्दयी हो।”
“सुमित्रा कैसी लगी भारती?”
भारती का सिर झुक गया। लज्जा के कारण उत्तर न दे सकी। लेकिन उत्तर मांगा भी नहीं गया।
कुछ देर दोनों चुपचाप बैठे रहे। लेकिन इस छोटी-सी खामोशी में ही उस आश्चर्यमय व्यक्ति के उससे भी अधिकर आश्चर्यमय हृदय के रहस्य से आवृत्त अंतस्थल में सहसा बिजली-सी कौंध उठी।
लेकिन दूसरे ही पल डॉक्टर ने सब कुछ दबाकर बच्चे की तरह सिर हिलाकर स्निग्ध स्वर में कहा, “अपूर्व के साथ तुमने बहुत बड़ा अन्याय किया है भारती। इतना भयंकर कांड इसमें छिपा है कि इसकी उस बेचारे ने कल्पना भी शायद नहीं की होगी। तुमसे सच कहता हूं, इतना छोटा, इतना क्षुद्र वह बिल्कुल नहीं है। नौकरी करने विदेश आया है, घर में मां है, भाई हैं। देश में बंधु-बांधव हैं। सांसारिक उन्नति करके दस-पांच में बड़ा आदमी बनेगा - यही उसकी आशा है। लिखना-पढ़ना सीखा है। भले आदमी का लड़का है। पराधीनता की लज्जा अनुभव करता है। और वह बंगाली लड़कों की तरह वास्तव में देश का कल्याण चाहता है। इसीलिए जब तुमने कहा कि 'पथ के दावेदार' के सदस्य बन जाओ, तब उसने कह दिया, 'बहुत अच्छा।' तुम्हारी बात मान लेने से उसका कभी कोई अहित नहीं होगा, उसे विश्वास है। इस पराए देश में, आपद-विपद में तुम्हीं एक मात्र सहारा थीं। पर तुम ही उसे अचानक मृत्यु के मुंह में धकेल दोगी, क्या वह जानता था?”
भारती ने आंख पोंछने के लिए मुंह नीचा करके कहा, “तुम उनके लिए इतनी वकालत क्यों करते हो? वह इसके योग्य नहीं है। सारी बातें कल उनके मुंह से ही सुन चुकी हूं। इसके बाद उन पर श्रद्धा रखना उचित नहीं है।”
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