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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने हंसकर कहा, “जीवन में अगर एक अनुचित काम तुम कर डालोगी तो क्या होगा? तुमने ध्यान से नहीं देखा भारती, लेकिन मैंने देखा है। उन लोगों ने जब उसे रस्सी से बांधा तो वह अवाक् हो गया। उन लोगों ने पूछा, “तुमने यह सब बातें कही हैं।” उसने कहा, “हां।” उन लोगों ने कहा, “इसका दंड है मृत्यु, तुमको मरना होगा।”- इसके उत्तर में वह टकटकी बांधे ताकता रह गया। मैं जानता हूं, उस समय उसकी विह्नल आंखें किसी को खोज रही थीं। इसीलिए मैंने तुम्हें बुलाने के लिए आदमी भेजा था बहिन। अब उसने तुमको चाहे जो भी कुछ कहा हो भारती, लेकिन इस धक्के से वह अब तक शायद संभल नहीं सका है।”
भारती अपने आप पर काबू न रख सकी। आंखों से झर-झर आंसू बहाते हुए बोली, “मुझे यह सब बातें सुना रहे हो भैया? तुम से बढ़कर अधिक विपत्ति में और कोई नहीं पड़ा। फिर भी केवल मेरा मुंह देखकर उन्हें बचाने के लिए तुमने घर-बाहर दुश्मन पैदा कर लिए।”
“यह बात तो है।”
“फिर तुम उनको बचाने क्यों गए। बताओ?”
“अपूर्व को बचाने गया? अरे छि:.... मैं बचाने गया। भगवान की इस अमूल्य कृति को, जो वस्तु तुम लोगों की तरह साधारण नारी को ध्यान में रखकर तैयार हुई है। क्या कोई मूर्ख ऐसा है जो ब्रजेन्द्र जैसे बर्बरों को उसे नष्ट कर डालने के लिए दे देता? केवल इतनी ही बात थी भारती। ....केवल इतनी है। अन्यथा मनुष्य के प्राणों का मूल्य क्या हम लोगों की दृष्टि में कुछ है? एक प्राणी कोड़ी के बराबर नहीं।”....कहकर डॉक्टर हंसने लगे।
भारती ने आंखें पोंछते-पोंछते कहा, “क्यों हंसते हो भैया? तुम्हारी हंसी देखकर मेरे बदन में आग लग जाती है। जी चाहता है, तुम्हें आंचल में बांधकर किसी जंगल में ले जाकर सदा के लिए छिपाकर रख दूं। जो लोग तुम्हें पकड़कर फांसी देंगे, वह ही क्या तुम्हारा मूल्य जानते हैं? उन्हें क्या ज्ञान हो जाएगा कि उन्होंने संसार का कितना बड़ा सर्वनाश कर डाला है? अपने देश के ही आदमी तुमको हत्यारा, डाकू, खून का प्यासा, न जाने क्या-क्या कहते हैं। लेकिन मैं सोचती हूं कि तुम्हारे हृदय में इतना स्नेह, और इतनी करुणा है, कि तुम इन लोगों के साथ कैसे हो?”
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