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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने एक लम्बी सांस ली।
डॉक्टर बोले, “नर-हत्या करना मेरा व्रत नहीं है बहिन।”
“लेकिन आवश्यकता पड़ने पर?”
“लेकिन ब्रजेन्द्र की आवश्यकता और सव्यसाची की आवश्यकता एक नहीं है।”
भारती बोली, “मैं जानती हूं, लेकिन मैं तुम्हारी ही आवश्यकता की बात पूछ रही हूं भैया।”
डॉक्टर ने यह सुनकर धीरे-धीरे कहा, “मेरी उस आवश्यकता का दिन कब आएगा, कौन जानता है? लेकिन भारती तुम यह जानना मत चाहो। उसके स्वरूप को तुम कल्पना में भी सहन न कर पाओगी।”
“इसके अतिरिक्त क्या और कोई मार्ग नहीं है?”
“नहीं।”
भारती हतबुद्धि-सी हो गई। व्याकुल होकर बोली, “इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं हो सकता भैया?”
“नहीं, मार्ग अवश्य है। स्वयं को भुलावे में डालने के अनेक मार्ग हैं लेकिन सत्य तक पहुंचने के लिए और कोई दूसरा मार्ग नहीं है।”
भारती स्वीकार न कर सकी। मधुर स्वर में बोली, “भैया, तुम ज्ञानी हो। इस एकमात्र लक्ष्य को सामने रखकर तुम संसार भर में घूम आए हो। तुम्हारी जानकारियों की सीमा नहीं है। मैंने तुम जैसा महान व्यक्ति और कोई नहीं देखा। मुझे तो ऐसा लगता है कि तुम्हारी सेवा करते हुए मैं सारा जीवन बिता सकती हूं। तुम्हारे साथ मेरा तर्क करना शोभा नहीं देता। बोलो, मेरे अपराध क्षमा कर दोगे?”
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