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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने हंसकर कहा, “भला तुमने क्या अपराध किया है?”
भारती उसी स्निग्ध विनय से बोली, “मैं ईसाई हूं। बचपन से ही अंग्रेजों को अपना आत्मीय समझकर इतनी बड़ी हुई हूं। आज उनके प्रति मन में घृणा पैदा करते हुए बहुत कष्ट होता है, लेकिन यह बात तुम्हारे अतिरिक्त और किसी के सामने नहीं कह सकती। फिर भी तुम लोगों की तरह ही मैं भारतवर्ष के बंग देश की लड़की हूं। मुझ पर अविश्वास मत करो।”
उसकी बात सुनकर डॉक्टर ने स्नेहपूर्वक अपना दायां हाथ उसके माथे पर रखकर कहा, “यह आशंका क्यों करती हो भारती, तुम जानती हो, तुम पर मेरा कितना विश्वास है। तुम्हें कितना स्नेह करता हूं।”
भारती बोली, “जानती हूं। और क्या मेरी ओर से ठीक यही बात तुम नहीं जानते भैया? तुम्हें भय नहीं है। तुमको भय दिखाया भी नहीं जा सकता। केवल इसीलिए तुमसे नहीं कह सकती कि तुम अब इस मकान में मत आना। लेकिन यह भी जानती हूं कि आज रात के बाद फिर कभी-नहीं नहीं, सो नहीं। शायद बहुत दिनों तक फिर भेंट न हो। उस दिन जब तुमने सारी अंग्रेज जाति पर भीषण आरोप लगाया था, मैंने प्रतिवाद नहीं किया था। लेकिन ईश्वर से निरंतर यही प्रार्थना करती रही हूं कि इतना बड़ा विद्वेष कहीं तुम्हारे अंतर के सम्पूर्ण सत्य को ढक न दे। भैया, फिर भी मैं तुम लोगों की ही हूं।”
डॉक्टर बोले, “मैं जानता हूं तुम हमारी हो।”
“तो इस मार्ग को तुम त्याग दो।”
डॉक्टर चौंक पड़े, “कौन-सा मार्ग?”
“विप्लववादियों का यह मार्ग।”
“छोड़ने को क्यों कहती हो?”
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