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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
मल्लाह डरकर रुक गया। उसकी उम्र पचास के ऊपर पहुंच चुकी है लेकिन अभी तक शौक नहीं गया। बेल-बूटेदार लुंगी पहने है। लेकिन तेल और मैल से वह बहुत ही गंदी हो गई हुई। शरीर पर कीमती फ्राक कोट है। शायद किसी पुराने कपड़ों की दुकान से खरीदा गया है। सिर पर बेलदार चिथडे क़ी टोपी है।
सहसा पहचानकर भारती बोली, “भैया, आपका चेहरा चाहे जैसा ही क्यों न हो, आप तो गले की आवाज तक को बदलकर उसे मुसलमान बना चुके हो।”
मल्लाह बोला, “जाऊं या पुलिस को बुला रही हो।”
भारती बोली, “पुलिस को बुलाकर तुमको गिरफ्तार करा देना ही उचित होगा। अपूर्व बाबू की इच्छा को अपूर्ण क्यों रहने दूं।”
मल्लाह बोला, “उसी की बात कर रहा हूं। आओ, ज्वार अब अधिक देर तक नहीं रहेगा। अभी दो कोस रास्ता चलना है।”
भारती नाव पर जा बैठी। उसे ठेलकर डॉक्टर साहब पक्के मल्लाह की तरह आगे बढ़े। जैसे दोनों हाथों से पतवार चलाना ही उनका पेशा हो।
“लामा जहाज चला गया, देख लिया?” उन्होंने पूछा।
“हां।”
“अपूर्व उस ओर के फर्स्ट क्लास वाले डेक पर थे।”
“नहीं।”
डॉक्टर बोले, “उनके डेरे पर या ऑफिस में जाने का कोई उपाय नहीं था। इसलिए जेटी के एक ओर शेम्पन लगाकर मैं ऊपर खड़ा था। हाथ उठाकर सलाम करते ही....?”
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