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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
7
जलमार्ग से आने वाले शत्रु के जलयानों को रोकने के लिए नगर के अंतिम छोर पर नदी के किनारे मिट्टी का एक छोटा-सा किला है। उसमें संतरी अधिक नहीं रहते। केवल तोपें चलाने के लिए कुछ गोरे गोलंदाज रहते हैं। अंग्रेजों के इस विघ्नहीन शांतिकाल में यहां विशेष कड़ाई नहीं थी। प्रवेश की मनाही है। लेकिन अगर कोई भूला-भटका व्यक्ति सीमा के अंदर पहुंच जाता तो उसे भगा देते हैं। बस इतना ही। भारती कभी-कभी अकेली यहां आ बैठती थी। जिन लोगों पर किले की रक्षा का भार था उन लोगों ने उसे देखा न हो, ऐसी बात नहीं थी। लेकिन शायद भले घर की महिला समझकर वह लोग आपत्ति नहीं करते थे।
सूर्य अभी-अभी अस्त हुआ था। अंधेरा होने में अभी कुछ देर थी। पक्षियों की आवाजें इधर-उधर मंडरा रही थीं।
सहसा नदी के दायीं ओर के मोड़ से छोटी-सी रोशनी शेम्पेन नाव सामने आ गई। नाव में मल्लाह के अतिरिक्त और कोई नहीं था। भारती के चेहरे की ओर देखकर उसने अपनी बंगला भाषा में कहा, “मां, उस पार जाओगी? एक आना देने से ही उस पार पहुंचा दूंगा।”
भारती बोली, “नहीं।”
मल्लाह ने कहा, “अच्छा दो पैसे ही दे दो-चलो।”
भारती बोली, “नहीं भैया, मेरा घर इसी पार है।”
मल्लाह गया नहीं। जरा हंसकर बोला, “पैसा न हो तो न दो। चलो तुम्हें घूमा लाऊं,” यह कहकर उसने नाव घाट पर लगा दी।
भारती भयभीत हो उठी। अंधेरा और निर्जन स्थान। वह जानती थी कि चटगांव के मुसलमान मल्लाह बहुत ही दुष्ट होते हैं। खड़ी होकर क्रुद्ध स्वर में बोली, “चले जाओ वरना पुलिस बुला लूंगी।”
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