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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने कोई उत्तर नहीं दिया।
“मेरी ओर एक बार देखो न भैया?”
डॉक्टर ने ज्यों की भारती की ओर देखा, उसके होंठ थर-थर कांपने लगे। बोली, “मनुष्य होकर मनुष्यता की कहीं भी कोई बात नहीं, यह कैसे हो सकता है भैया?”
यह कहकर उसने दोनों दांतों को भींचकर अपने होंठों का कांपना रोक लिया। लेकिन आंखों की कोरों से आंसू बहने लगे।
डॉक्टर ने न तो सहमति प्रकट की, न प्रतिवाद किया। सांत्वना तक की कोई बात उसके मुंह से नहीं निकली। केवल क्षण भर के लिए ऐसा लगा जैसे उसकी सुरमा लगी आंखों की दीप्ति कुछ फीकी पड़ गई हो।
इरावती की यह छोटी शाखा कम गहरी और कम चौड़ी होने के कारण स्टीमर और बड़ी नावें नहीं चलती थीं। नाव कहां जा रही है, भारती को पता नहीं था।
अचानक एक बहुत बड़े वृक्ष की ओट में बेलों और वृक्षों से भरे नाले में नाव घुसने लगी तो यह देखकर उसने चकित होकर पूछा, “मुझे कहां ले जा रहे हो भैया?”
“अपने डेरे पर।”
“वहां और कौन रहता है?”
“कोई नहीं।”
“मुझे मेरे डेरे पर कब पहुंचाओगे?”
“पहुंचा दूंगा। आज रात या कल सवेरे।”
भारती बोली, “नहीं भैया, यह नहीं हो सकता। मुझे जहां से लाए हो वहीं पहुंचा दो।”
“लेकिन मुझे तुमसे बहुत-सी बातें कहनी हैं भारती।”
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