|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसी तरह सिर हिलाकर आपत्ति प्रकट करती हुई बोली, “नहीं, मुझे वापस पहुंचा आओ।”
“लेकिन क्यों? क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?”
भारती सिर झुकाए चुप बैठी रही।
डॉक्टर ने कहा, “तुमने इस प्रकार कितनी ही रातें अपूर्व के साथ बिताई हैं। क्या वह मुझसे बढ़कर विश्वासपात्र था तुम्हारा?”
भारती चुप रही। उसने हां-ना, कुछ नहीं कहा।
नाले में जितना अंधेरा था उतना ही वह तंग भी था। दोनों किनारों पर खड़े पेड़ों की डालियां बीच-बीच में उनके शरीर पर आकर लगने लगीं।
डॉक्टर ने कहा, “भारती, आज मैं तुम्हें ले जा रहा हूं वहां से तुम्हारा उद्धार कर सके, संसार में ऐसा कोई नहीं है। लेकिन मेरे मन की बात समझने में शायद अब कुछ शेष न रहा होगा।”
यह कहकर वह जोर से हंसने लगे। अंधेरे में उनके चेहरे को भारती न देख सकी। लेकिन उनकी हंसी ने जैसे उसे धिक्कारा। मुंह ऊपर उठाकर शंकारहित स्वर में बोली, “तुम्हारे मन की बात समझ सकूं, इतनी बुद्धि मुझ में नहीं है। लेकिन मैं तुम्हारे चरित्र से परिचित हूं। अकेली रहना मेरे लिए उचित नहीं है इसीलिए कह रही हूं भैया, मुझे क्षमा करो।”
डॉक्टर ने कुछ देर चुप रहकर स्वाभाविक शांत स्वर में कहा, “भारती, तुम्हें छोड़कर आने में मुझे कष्ट होता है। तुम मेरी बहिन हो, मेरी मां हो - यदि स्वयं यह विश्वास न होता तो मैं इस रास्ते से नहीं आता। लेकिन तुम्हारा मूल्य दे सके ऐसा मनुष्य मेरे अतिरिक्त संसार में और कोई नहीं है। इसके सौवें अंश का भी एक अंश अगर अपूर्व समझ जाता तो उसका जीवन सार्थक हो जाता। तुम संसार में लौट जाओ दीदी! हम लोगों के बीच अब मत रहो। केवल तुम्हारी बात कहने के लिए ही मैं अपूर्व से मिलने गया था।”
|
|||||

i 








