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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने हंसकर कहा, “याद तो जरूर है।”
शशि ने कहा, “याद रहने की बात ही है। आप सहायता न करते तो उस दिन हम लोगों की जीवन-लीला समाप्त हो जाती। शंघाई बोट में फिर कदम न रखना पड़ता। वहां जैसे नाटे लुच्चे-बदमाश भारत में कहीं भी नहीं मिलेंगे। मैं तो आप लोगों के बमबाज दस्ते में शामिल नहीं था। बस डेरे पर रहता था। बेहला सिखाया करता था। लेकिन इस बात को क्या कोई सुनने वाला था? शैतानों के न तो कानून होते हैं न अदालत। पकड़ पाते तो मुझे जरूर जिबह कर डालते। आज जो ये सब बातें कह रहा हूं, केवल आपकी उसी कृपा से। ऐसा मित्र संसार में दूसरा नहीं है। ऐसी दया भी संसार में कहीं नहीं देखी।”
भारती की आंखों में आंसू भर आए। बोली, “अपनी पूरी कहानी किसी दिन हम लोगों को सुना दो न भैया। भगवान ने तुमको इतनी बुद्धि दी थी तो क्या केवल इस अमूल्य प्राण का मूल्य समझने की बुद्धि देना ही भूल गए? जापानियों के देश में ही अब फिर जाना चाहते हो?”
शशि ने कहा, “मैं ठीक यही बात कहता हूं भारती। कहता हूं, इतनी बड़ी स्वार्थी, लोभी और नीच जाति से कुछ आशा मत करो। वह लोग किसी भी दिन आपकी कोई सहायता नहीं कर सकते।”
डॉक्टर ने हंसते हुए कहा, “कमर में रस्सी बांधने की घटना भी शशि भूल नहीं सका। न इस जीवन में वह जापानियों को ही क्षमा कर सका। लेकिन इतना ही उनका सब कुछ नहीं है भारती। इतनी आश्चर्यजनक जाति भी संसार में और कोई नहीं है। केवल आज की बात नहीं है। प्रथम दृष्टि में ही जिस जाति ने यह कानून बना दिया कि जब तक सूर्य-चंद्र रहेंगे। उस राज्य में ईसाइयों का प्रवेश नहीं होगा। और अगर प्रवेश करें तो उन्हें कठोर दंड दिया जाए। ऐसी जाति भले ही कुछ भी क्यों न करे हमारे लिए अभिनंदनीय है।”
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