|
उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
286 पाठक हैं |
||||||||
हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
उसके कंठ स्वर का अंतिम अंश भारी-सा हो गया। शशि ने ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने पर उसका तात्पर्य शायद समझ भी नहीं पाता। लेकिन इसमें निहित अर्थ जिसे समझना चाहिए था। उन्हें समझने में देर नहीं लगी।
दो मिनट तक सभी मौन रहे।
डॉक्टर ने बात शुरू की। बोले, “शशि, दो दिन के भीतर ही मैं जा रहा हूं। पैदल के रास्ते से। पैसिफिक के सारे आइलैंड एक बार फिर घूम आऊं। कब लौटूंगा-नहीं जानता। लौटूंगा भी या नहीं, यह कौन जानता है। लेकिन यदि कभी लौटूं शशि तो तुम्हारे घर में शायद मुझे स्थान नहीं मिलेगा।”
शशि पल भर उनके मुंह की ओर टकटकी लगाकर देखता रहा। फिर बोला उसका चेहरा और स्वर आश्चर्यजनक रूप से बदल गया। गर्दन हिलाकर बोला, “मेरे घर पर आपको सदा स्थान मिलता रहेगा।”
डॉक्टर ने कहा, “यह क्या कहते हो शशि? मुझे स्थान देने से बड़ी विपत्ति मनुष्य के लिए और क्या हो सकती है?”
शशि ने कहा, “यह तो मैं जानता हूं कि मुझे जेल की सजा मिलेगी। मिलने दो।” कहकर वह चुप हो गया। फिर पलभर बाद भारती को सम्बोधित करके धीरे-धीरे कहने लगा, “मेरा ऐसा मित्र और कोई नहीं है। सन् 1911 में जापान के टोकियो शहर में बम गिरने के कारण जब कोटकू के समूचे गिरोह को फांसी की सजा मिली थी तब डॉक्टर उनके अखबार के उपसम्पादक थे। मकान के सामने के हिस्से को पुलिस ने घेर लिया था। मैं रोने लगा तो इन्होंने कहा, डरने से काम नहीं चलेगा शशि, हम लोगों को भाग जाना चाहिए। पीछे की खिड़की से रस्सी लटकाकर इन्होंने मुझे उतार दिया फिर स्वयं उतर गए - ओह, याद है आपको डॉक्टर साहब? यह कहकर वह अतीत की यादों से रोमांचित हो उठा।”
|
|||||

i 








