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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
शशि ने कहा, आपको मालूम नहीं? हम लोगों की प्रेसीडेंट साहिबा आ रही हैं। शायद....।”
भारती ने विस्मित होकर पूछा, “कौन प्रेसीडेंट? सुमित्रा जीजी?”
शशि ने सिर हिलाकर कहा, “हां।”
यह कहकर वह तेजी से कदम बढ़ाकर द्वार खोलने लगा।
भारती डॉक्टर के मुंह की ओर ताकती रही। उसके मन में यह बात आ गई कि वह अपने यहां आने का कारण समझ चुकी है। आज की रात बेकार नहीं जाएगी। सम्भावित विघ्न-बाधाओं के बीच पथ के दावेदारों की अंतिम मीमांसा आज होनी आवश्यक है। हो सकता है - अय्यर हो, तलवलकर हो। और कौन जाने निरापद समझकर ब्रजेन्द्र ने ही शहर छोड़कर इस जंगल में आश्रय लिया हो। डॉक्टर ने अपने स्वभाव और नियम के अनुसार पिस्तौल छिपाया नहीं। उसे बाएं हाथ में उसी तरह पकडे रहे। उनके शांत चेहरे से कोई भी बात जानी नहीं जा सकी। लेकिन भारती का चेहरा एकदम पीला पड़ गया था।
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