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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
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जिन-जिन लोगों ने कमरे में प्रवेश किया वह सभी अच्छी तरह जाने-पहचाने लोग थे।
डॉक्टर ने कहा, “आओ।” लेकिन उनके चेहरे का भाव देखते ही भारती समझ गई, कम-से-कम आज वह इसके लिए तैयार नहीं थे।
सुमित्रा के आने के बारे में उन्हें पता था। लेकिन सभी लोग उनके पीछे-पीछे चलते हुए इस पार आ इकट्ठे हुए हैं, इसकी जानकारी उन्हें नहीं थी। किसी भी तरह की कोई आकस्मिक घटना नहीं हुई है इसलिए उनकी जानकारी के बिना ही किसी तरह का गहन परामर्श हो चुका है। इसमें संदेह नहीं है। आगंतुक लोग आकर चुपचाप फर्श पर बैठ गए। किसी के आचरण से रत्ती भर भी आश्चर्य या उत्तेजना प्रकट नहीं हुई। यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ गई कि डॉक्टर के संबंध में भले न हो लेकिन डॉक्टर के आने के संबंध में वह पहले ही जान गए थे। अपूर्व के मामले को लेकर दल में इस प्रकार मतभेद पैदा हो जाएगा यह आशंका भारती के मन में थी। शायद आज ही इसका निश्चित निर्णय हो जाएगा। यह सोचकर भारती के हृदय में कंपकंपी होने लगी।
सुमित्रा के चेहरे पर उदासी थी। उसने भारती से कोई बात नहीं की। उसकी ओर अच्छी तरह देखा तक नहीं। ब्रजेन्द्र ने अपनी गेरुआ पगड़ी उतारकर अपनी मोटी लाठी से दबाकर पास रख ली और अपनी विशाल शरीर को काठ की दीवार से टिकाकर आराम से बैठ गया। उसकी गोलाकार आंखों की हिंस्र दृष्टि कभी भारती और कभी डॉक्टर के चेहरे पर चक्कर काटने लगी। रामदास तलवलकर चुप था। बैरिस्टर कृष्ण अय्यर सिगरेट जलाकर पीने लगा और नवतारा सबसे दूर इस तरह जा बैठी जैसे उसका किसी के साथ कोई संबंध ही न हो। आज वह भारती को पहचान भी न सकी हो। किसी के चेहरे पर मुस्कराहट तक का नाम नहीं था।
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