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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने कहा, “याद रहेगा शशि, याद रहेगा। यह वस्तु संसार में इतनी सुलभ नहीं है कि कोई भूल जाए।”
शशि ने कहा, “आप कब जाइएगा?”
डॉक्टर बोले, “तुम तो उम्र में मुझसे छोटे हो। इसलिए आशीर्वाद देकर जा रहा हूं कि तुम सुखी रहो।”
शशि ने कहा, “क्या अगले शनिवार तक नहीं ठहर सकते?”
भारती बोली, “शनिवार को इनका विवाह होगा।”
डॉक्टर कुछ नहीं बोले। सामने ही कीचड़ में पड़ी टेढ़ी नाव पर यत्नपूर्वक भारती को चढ़ाकर स्वयं भी चढ़ गए।
शशि ने कहा, “शनिवार तक आपको रुकना होगा। जीवन में अनेक भीखें दी हैं। यह भी दीजिए। भारती, आपको भी उस दिन आना होगा।”
भारती चुप रही। डॉक्टर ने कहा, “यह नहीं आएगी शशि। अगर रुका रहा तो आऊंगा और तुम लोगों को आशीर्वाद दे जाऊंगा। मैं वचन देता हूं। अगर न आऊं तो समझ लेना कि सव्यसाची के लिए आना असम्भव था। लेकिन जहां भी रहूं प्रार्थना करूंगा कि तुम्हारा शेष जीवन सुख से बीते।” यह कहकर नाव चला दी।
भारती बोली, “आज अकेली होती तो इतना रोती कि नदी का जल बढ़ जाता। भैया, भविष्य में सभी को सुखी होने का अधिकार है। नहीं है केवल तुम को। शशि बाबू इतना अशोभनीय काम करने जा रहे हैं उन्हें भी जी खोलकर आशीर्वाद दे आए। लेकिन इस संसार में तुम्हें आशीर्वाद देने वाला कोई नहीं है। तुम गुरुजन हो, चाहे जो भी हो। लेकिन आज तुम्हें मैं आशीर्वाद दूंगी कि तुम्हारा भविष्य सुखमय हो।”
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