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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती सपने में डूबी-सी बैठी थी। इशारा पाते ही चुपचाप उठ खड़ी हुई। उसे अपने आगे करके डॉक्टर कमरे से बाहर निकल गए। दरवाजे पर से सबको सम्बोधित करके बोले, “गुडनाइट।”
इस विदाई-शिष्टाचार का किसी ने उत्तर नहीं दिया। सभी अभिभूत से स्तब्ध बैठे रहे।
भारती के नीचे उतर जाने के बाद जब डॉक्टर ऊपर की ओर नजर रखकर धीरे-धीरे उतर रहे थे तभी सहसा शशि दरवाजे में से मुंह निकालकर बोला, “लेकिन मुझे तो आपसे बहुत जरूरी काम है डॉक्टर।”यह कहकर नीचे उतर उनके पास आ खड़ा हुआ और सांस रोककर बोला, “मेरी गणना तो मनुष्यों में की ही नहीं जाती डॉक्टर। आपके किसी काम आने की शक्ति मुझ में नहीं है लेकिन आपका ऋण जीवन पर्यन्त नहीं भूलूंगा।”
डॉक्टर ने स्नेहपूर्वक उसका हाथ खींचते हुए कहा, “कौन कहता है कि तुम मनुष्य नहीं हो? तुम कवि हो, गुणी हो, अनेक मनुष्यों से बड़े हो।”
“आप कहीं भी क्यों न रहें, मेरे पास जो कुछ है सब आपका है, इस बात को मत भूल जाइएगा।”
भारती ने उत्सुक होकर पूछा, “क्या बात है भैया?”
डॉक्टर ने हंसते हुए कहा, “दुर्दिन में तो इन्हें चिंता नहीं थी लेकिन अचानक अच्छे दिन आते ही उन्हें चिंता हो गई है कि कहीं ऐसा न हो कि इन्हें कृतज्ञता का ऋण याद ही न रहे। इसलिए कह रहे हैं कि जो कुछ इनके पास है सब मेरा है।”
भारती बोली, “ऐसी बात है शशि बाबू?”
शशि कुछ नहीं बोला।
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