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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
डॉक्टर ने कहा, “इसका अर्थ तो यही है कि तुम भी इन लोगों की तरह मुझे छोड़कर जाना चाहती हो।”
यह सुनकर भारती क्षोभ से व्याकुल हो उठी। बोली, “इतनी बड़ी अन्यायपूर्ण बात तुम मुझसे कह सकते हो भैया। तुम जो इच्छा हो कह सकते हो। लेकिन मैं अपनी ही इच्छा से तुम्हें छोड़कर चली गई, यह बात याद आने पर एक दिन भी जीवित रह सकती हूं, ऐसा तुम्हारा खयाल है? मैं तुम्हारा ही काम करती रहूंगी जब तक कि तुम अपनी इच्छा से मुझे छुट्टी न दोगे।” थोड़ी देर रुककर बोली, “लेकिन मैं जानती हूं कि मनुष्य की हत्या करते हुए घूमते रहना ही तुम्हारा वास्तविक काम नहीं है। तुम्हारा वास्तविक काम है मनुष्य को मनुष्य की तरह जीवित रखना। मैं तुम्हारे इसी काम में लगी रहूंगी और मैं यही सोचकर तुम लोगों की बीच आई थी।”
डॉक्टर ने पूछा, “यह मेरा कौन-सा काम है?”
भारती बोली, “पथ के दावेदारों को गुप्त समिति के रूप में परिणत करने की जरूरत नहीं है। कारखाने के मजदूर-मिस्त्रियों की हालत मैं अपनी आंखों से देख आई हूं। उनके पास कुशिक्षा और उनकी जानवरों जैसी हालत-अगर समूचे जीवन में उनका रत्ती भर भी प्रतिकार कर सकूं तो इससे बढ़कर मेरे जीवन की सार्थकता और क्या हो सकती है? सच बताओ भैया, यह क्या तुम्हारा काम नहीं है।”
डॉक्टर बोले, “यह काम तुम्हारा नहीं है भारती। तुम्हारे लिए दूसरा काम है। यह काम सुमित्रा का है। मैंने इस काम का सारा भार उसी पर छोड़ रखा है।”
भारती चुप रही।
डॉक्टर ने उसी तरह शांत और मृदु स्वर में कहा, “तुमसे कह देना ही उचित है भारती। कुछ थोड़े से कुली-मजदूरों की भलाई के लिए ही मैंने 'पथ के दावेदार' की स्थापना नहीं की है। इसका लक्ष्य बहुत बड़ा है। उस लक्ष्य के लिए, हो सकता है किसी दिन इन्हीं लोगों को भेड़-बकरियों की तरह बलि चढ़ा देना पड़े - तुम उसमें मत रहना बहिन। तुम इसे न कर सकोगी।”
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