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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती चौंककर बोली, “यह तुम क्या कह रहे हो भैया? क्या मनुष्यों की बलि चढ़ाओगे?”
डॉक्टर ने कहा, “मनुष्य हैं कहां? जानवर ही तो हैं।”
भारती बोली, “मनुष्य के संबंध में तुम मजाक में भी ऐसी बात मुंह से मत निकालना, कहे देती हूं। झूठ-मूठ डराने की कोशिश मत करो।”
डॉक्टर बोले, “नहीं भारती, झूठ-मूठ नहीं। सचमुच डराने की कोशिश कर रहा हूं जिससे मेरे चले जाने के बाद तुम कुली-मजदूरों की भलाई के चक्कर में न पड़ो। इस तरीके से इनकी भलाई नहीं की जा सकती। इनकी भलाई की जा सकती है केवल क्रांति के द्वारा। इसी मार्ग पर चलने के लिए मैंने पथ के दावेदार की रचना की है। क्रांति शांति नहीं है। उसे हमेशा हिंसा के बीच से ही कदम रखकर चलना पड़ता है। यही उसका वरदान है और यही अभिशाप! एक बार यूरोप की ओर ध्यान से देखो। हंगरी में ऐसा ही हुआ है। कुली-मजदूरों के खून से उस दिन नगर के सभी राजपथ रक्तिम हो उठे थे। जापान में तो अभी उसी दिन की बात है-उस देश में भी मजदूरों के दु:ख का इतिहास बिंदु बराबर भी इससे भिन्न नहीं है। मनुष्य के चलने का मार्ग बिना उपद्रव नहीं बनता भारती।”
भारती सिहरकर बोली, “यह मैं नहीं जानती। लेकिन उन सब भयानक उपद्रवों को क्या तुम इस देश में भी खींच लाओगे? कारखानों के रास्ते में क्या मजदूरों के रक्त की नदी बहा देना चाहते हो?”
डॉक्टर ने सहज भाव से कहा, “अवश्य चाहता हूं महामानव के मुक्ति सागर में मानवीय रक्त धारा तरंगित होकर दौड़ती जाएगी, यही मेरा स्वप्न है। इतने दिनों का पर्वत जैसा विशाल पाप धुलेगा किस चीज से? और इस धुलाई के काम में अगर तुम्हारे भैया के दो बूंद रक्त की भी आवश्यकता पड़ेगी तो मैं हंसकर बहाऊंगा।”
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