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उपन्यास >> पथ के दावेदार पथ के दावेदारशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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हम सब राही हैं। मनुष्यत्व के मार्ग से मनुष्य के चलने के सभी प्रकार के दावे स्वीकार करके, हम सभी बाधाओं को ठेलकर चलेंगे। हमारे बाद जो लोग आएंगे, वह बाधाओं से बचकर चल सकें, यही हमारी प्रतिज्ञा है।
भारती बोले, “इतना तो मैं आपको पहचानती हूं भैया। लेकिन क्या देश में अशांति फैला देने के लिए ही तुम जाल बिछाकर बैठे हो? इससे बड़ा आदर्श क्या आपके पास नहीं है?”
डॉक्टर बोले, “आज तक तो मिला नहीं बहिन, बहुत घूम चुका, पढ़ चुका और विचार कर चुका। लेकिन भारती, अशांति उत्पन्न करने का अर्थ अकल्याण उत्पन्न करना नहीं है। शांति, शांति सुनते-सुनते कान बहरे हो गए हैं। इस असत्य का प्रचार किन लोगों ने किया, जानती हो? दूसरों की शांति का हरण करके जो प्रासादों में बैठे हैं, वह ही इसके प्रवर्तक हैं। वंचित, पीड़ित नर-नारियों को लगातार यह मंत्र सुनाकर उन लोगों को ऐसा बना दिया है कि वे अशांति के नाम से ही चौंक उठते हैं और सोचने लगते हैं कि शायद यह पाप है, अमंगल है। बंधी हुई गाय खड़ी-खड़ी मर ही जाती है, लेकिन पुरानी रस्सी को तोड़कर मालिक की शांति भंग नहीं करती, इसीलिए तो आज दरिद्रों के चलने का मार्ग एकदम बंद हो गया है। फिर भी उन्हीं लोगों की अट्टालिकाओं तथा प्रासादों को तोड़ने के काम में हम लोग भी उन्हीं लोगों के साथ मिलकर, अशांति कहकर रोने लगेंगे तो रास्ता कहां मिलेगा? यह नहीं हो सकता भारती। यह संस्था कितनी प्राचीन, कितनी पवित्र, कितनी ही सनातन हो, मनुष्य से बड़ी नहीं है। आज उन सब को हमें तोड़ चलना होगा।”
भारती सांस रोककर बोली, “इसके बाद?”
डॉक्टर बोले, “इसके बाद-वह फिर मजदूरों के दल में जाकर उन्हीं हत्यारों के द्वार पर हाथ फैलाते हैं, उन्हें उसकी दया भी मिलती है।”
“इसके बाद?”
“इसके बाद फिर एक दिन वह लोग दल-बद्ध होकर पुराने अत्याचारों के प्रतिकार की आशा से हड़ताल कर बैठते हैं। तब फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाने लगती है।”
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