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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
प्यारी ने इसका जवाब न देकर कहा, “इसके सिवाय किसलिए बर्मा जा रहे हो, कहो तो सही?”
“नौकरी करने, यहाँ-वहाँ भटकते फिरने के लिए नहीं।”
मेरी बात को सुनकर प्यारी उत्तेजना के वश सीधी होकर बैठ गयी और बोली, “देखो, दूसरे से जो कहना हो कहना, किन्तु मुझे न ठगना। मुझे ठगोगे तो तुम्हारा इहकाल भी नहीं, पर काल भी नहीं बनेगा - सो जानते हो?”
“सो तो खूब जानता हूँ, अब क्या करना चाहिए, कहो तुम?”
मेरी स्वीकारोक्ति से प्यारी प्रसन्न हुई। हँसकर बोली, “स्त्रियाँ चिरकाल से जो कहती आई हैं वही मैं कहती हूँ। विवाह करके संसारी बन जाओ - गृहस्थ-धर्म का पालन करो।”
मैंने प्रश्न किया, “क्या सचमुच ही तुम खुशी होओगी?”
उसने सिर हिलाकर कानों के झूले हिलाते हुए उत्साह से कहा, “निश्चय से, एक दफे नहीं, सौ दफे। इससे यदि मैं सुखी नहीं होऊँगी, तो फिर और कौन होगा, बताओ?”
मैंने कहा, “सो तो मैं नहीं जानता; परन्तु, इससे मेरे मन की एक दुर्भावना चली गयी। वास्तव में, यही खबर देने मैं आया था कि ब्याह किये बगैर मेरी गुजर नहीं।”
प्यारी एक बार अपने कानों के स्वर्णालंकार झुलाती हुई महाआनन्द से बोल उठी, “ऐसा होगा, तो मैं कालीघाट जाकर पूजा दे आऊँगी। किन्तु, लड़की को मैं ही देखकर पसन्द करूँगी, सो कहे देती हूँ।”
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