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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने कहा, “इसके लिए अब समय नहीं है, लड़की तो स्थिर हो चुकी है।”
मेरे गम्भीर स्वर पर शायद प्यारी ने ध्यान दिया। एकाएक उसके हँसते मुख पर एक मैली-सी छाया पड़ गयी; बोली, “ठीक तो है, अच्छा ही हुआ। स्थिर हो गयी है तो परम सुख की बात है।”
मैंने कहा, “सुख-दु:ख तो मैं समझता नहीं राजलक्ष्मी, जो बात स्थिर हो चुकी है वही तुम्हें बताता हूँ।”
प्यारी एकाएक गुस्से से बोल उठी, “जाओ, चालाकी मत करो, सब बात झूठी है।”
“एक भी बात मिथ्या नहीं है। चिट्ठी देखते ही समझ जाओगी”, इतना कहकर खीसे में से मैंने दो पत्र बाहर निकाले।
“कहाँ हैं, देखूँ चिट्ठी”, इतना कह हाथ बढ़ाकर प्यारी ने दोनों हाथों में चिट्ठियाँ ले लीं। उन्हें हाथ में लेते ही मानों उसके सारे मुँह पर अंधेरा छा गया। दोनों पत्र हाथ में लिये ही लिये वह बोली, “दूसरे का पत्र पढ़ने की मुझे जरूरत ही क्या है। बताओ, कहाँ स्थिर हुई है?”
“पढ़ देखो।”
“मैं दूसरे की चिट्ठी नहीं पढ़ती।”
“तो फिर दूसरे की खबर जानने की तुम्हें जरूरत भी नहीं है।”
“मैं नहीं जानना चाहती।” इतना कहकर आँखें मींचकर वह लेट गयी। किन्तु दोनों चिट्ठियाँ उसकी मुट्ठी में ही रह गयीं। बहुत देर तक वह कुछ नहीं बोली। इसके बाद वह धीरे से उठी, जाकर लैम्प तेज किया और मेज पर दोनों पत्र रखकर स्थिरता से बैठी। उनमें जो कुछ लिखा था सो शायद उसने दो-तीन दफे पढ़ा। इसके बाद वह उठ आई और उसी तरह फिर लेट गयी। बहुत देर तक चुप रहने के बाद बोली, “सो गये क्या?”
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