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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
नन्द बोला, “अच्छा रहा।”
उसकी घरवाली गरज उठी, “खाक रहा अच्छा! मैया-री-मैया, कैसा अद्भुत काण्ड हो गया।”
कुछ उद्विग्न होकर मैंने पूछा, “कैसा काण्ड?”
नन्द मिस्री ने मेरे मुँह की ओर देखा, फिर जम्हाई ली। चुटकियाँ बजाईं और अन्त में कहा, “काण्ड ऐसा कुछ नहीं था बाबूजी। कलकत्ते की गलियों के मोड़ों पर साढ़े बत्तीस तरह का चबेना बेचते हुए आपने किसी को देखा है? यदि देखा हो तो हम लोगों की अवस्था को आप ठीक तौर से समझ सकेंगे। वह जिस तरह अंगूठे के नीचे दो-तीन अंगुलियों की चोट मारकर भुने हुए चावल, दाल, मटर, मसूर, चने, सेम के बीज आदि सबको एकाकार कर देता है, देवता की कृपा से हम सब भी ठीक उसी तरह गड्डमड्ड हो गये थे, अभी ही कुछ देर हुई सब कोई अपने-अपने कपड़े पहिचानकर फिर अपनी जगह आकर बैठे हैं।” इसके बाद वह टगर की ओर देखकर बोला, “बाबूजी, भाग्य से असल वैष्णव की जात नहीं जाती, नहीं तो मेरी टगर...”
टगर भड़के हुए भालू की तरह गरज उठी, “अब फिर वही!”
“नहीं, तो जाने दो”, कहकर नन्द उदासीनता से दूसरी तरफ को देखता हुआ चुप हो गया।
एक काबुली दम्पति, जो कि मलिनता के अवतार थे, सिर से पैर तक पृथ्वी की सारी गन्दगी लादे हुए अत्यन्त तृप्ति के साथ रोटी खा रहे थे। क्रुद्ध टगर उन हतभागों के प्रति अपने बड़े-बड़े चक्षुओं से एकटक होकर अग्नि वर्षण करने लगी। नन्द ने अपनी घरवाली को उद्देश्य करके प्रश्न किया, “तो फिर आज खाना-पीना कुछ न होगा, क्यों?”
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