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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
घरवाली ने कहा, “मौत और किसे कहते हैं? होगा कैसे, सुनूँ तो?”
मामला न समझ सकने के कारण मैंने कहा, “अभी तो बड़ी सकार है, कुछ बेला चढ़ जाने पर...”
नन्द मेरे मुँह की ओर देखकर बोला, “कलकत्ते से एक हाँड़ी में बढ़िया रसगुल्ले लाया था बाबूजी, जहाज पर सवार होने तक कहता रहा, “आओ टगर, कुछ खा लेवें, आत्मा को कष्ट न दें”, परन्तु नहीं- “मैं रंगून ले जाऊँगी।” (टगर के प्रति) ले, अब ले जा रंगून, क्या ले जाती है?”
टगर ने, इस क्रुद्ध अभियोग का स्पष्ट प्रतिवाद न कर, क्षुब्ध अभिमान से एक दफे मेरी ओर देखा और फिर, वह उस हतभागे काबुली को अपनी नजर से पहले के समान ही दग्ध करने लगी।
मैंने धीरे से पूछा, “क्या हुआ रसगुल्लों का?”
नन्द टगर को लक्ष्य करके कटाक्ष करता हुआ बोला, “उनका क्या हुआ सो नहीं कह सकता। वह देखो न फूटी हाँड़ी, और वह देखो बिछौने में गिरा हुआ रस। इससे ज्यादा कुछ जानना चाहो तो पूछो उस हरामजादे से।” इतना कहकर टगर की दृष्टि का अनुसरण कर वह भी कठोर दृष्टि से उनकी ओर ताकने लगा।
मैंने बड़ी मुश्किल से हँसी रोकते हुए मुँह नीचा करके कहा, “तो जाने दो, साथ में चिउड़ा तो है!”
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