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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


शहर में जिस दिन हम लोगों ने कदम रखे वह बर्मावासियों का एक त्योहार का दिन था। और, त्योहार तो उनके लगे ही रहते हैं। दल के दल स्त्री-पुरुष रेशमी पोशाक पहने अपने मन्दिरों को जा रहे हैं। स्त्री-स्वातन्त्रय का देश है; इसलिए, वहाँ के आनन्द-उत्सव में स्त्रियों की संख्या भी अधिक होती है। बूढ़ी, युवती, बालिका- सब उम्र की स्त्रियाँ अपूर्व पोशाक-परिच्छद में सज्जित होकर हँसती-बोलती-गाती सारे रास्ते को मुखरित करती हुई चली जा रही हैं। उनमें अधिकांश का रंग खूब गोरा है। मेघ की तरह घने बालों का बोझा सौ में से नब्बे स्त्रियों का घुटनों के नीचे तक लटकता है। जूड़े में फूल, कानों में फूल और गले में फूलों की माला। घूँघट की झंझट नहीं, पुरुषों को देखकर तेजी से जाने की व्यग्रता से ठोकर खाकर गिरने का अन्देशा नहीं, दुविधा या लाज का लेश नहीं- मानो झरने के मुक्त प्रवाह के समान स्वच्छन्द बेरोक गति से बही जा रही हैं। पहली ही दृष्टि से एकदम मुग्ध हो गया। अपने यहाँ की तुलना में मन ही मन उनकी अशेष प्रशंसा करके बोला, यही तो होना चाहिए! इसके बिना जीवन ही क्या है! उनका सौभाग्य सहसा मानो ईर्ष्या के समान मेरे हृदय में छिद गया। मैंने कहा, चारों दिशाओं में ये जिस आनन्द की सृष्टि करती जा रही हैं, वह क्या अवहेलना की वस्तु है? रमणियों को इतनी स्वाधीनता देकर इस देश के पुरुष क्या ठगे गये हैं? और, हम लोग क्या उनको नीचे से ऊपर तक जकड़ रखकर और उनके जीवन को लँगड़ा बनाकर लाभ में रहे हैं? हमारी स्त्रियाँ भी यदि किसी ऐसे ही दिन- एकाएक गोलमाल सुनकर मैंने लौटकर जो कुछ देखा वह आज भी मेरे मन पर साफ-साफ अंकित है। झगड़ा हो रहा था घोड़ा-गाड़ी के किराए के सम्बन्ध में। गाड़ीवान हमारे यहाँ का हिन्दुस्तानी मुसलमान था। वह कह रहा था कि आठ आने किराया तय हुआ है और तीन भले घर की बर्मी स्त्रियाँ गाड़ी पर से उतरकर एक साथ चिल्लाकर कह रही थीं कि नहीं, पाँच आना हुआ है। दो-तीन मिनट कहा-सुनी होने के बाद ही बस, 'बलं बलं बाहुबलं।' रास्ते के किनारे एक आदमी मोटे-मोटे गन्नों के टुकड़े करके बेच रहा था। अकस्मात् तीनों ने झपटकर उसके तीन टुकड़े उठा लिये और एक साथ गाड़ीवान पर आक्रमण कर दिया। ओह! वह कैसी बेधड़क मार थी। बेचारा स्त्रियों के शरीर पर हाथ भी नहीं लगा सकता था, आत्मरक्षा करने के लिए यदि एक को अटकाता था तो दूसरी की चोट सिर पर पड़ती, उसको अटकाता तो तीसरी की चोट आ पड़ती। चारों और लोग जमा हो गये- किन्तु केवल तमाशा देखने। उस अभागे का कहाँ गया टोपी-साफा और कहाँ गया हाथ का चाबुक! और अधिक न सह सकने के कारण आखिर वह मैदान छोड़कर 'पुलिस! पुलिस! सिपाही! सिपाही!' चिल्लाता हुआ भाग खड़ा हुआ।

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