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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैंने देखा कि बंगाली स्त्रियों की संख्या भी इस ओर कुछ कम नहीं है। यद्यपि उनके कुलों का परिचय न देना ही अच्छा है; किन्तु, आज वे किसी और दूसरे ही रूप में परिवर्तित होकर एकदम शुद्ध गृहस्थों की धर्मपत्नियाँ बन गयी हैं। पुरुषों के मनों में तो शायद आज भी 'जाति' की पुरानी स्मृति बाकी बनी हुई है। किन्तु, स्त्रियाँ तो न कभी देश आती हैं और न देश के साथ कोई सम्पर्क ही रखती हैं। उनके बच्चे-बच्चियों से पूछा जाय तो वे यही कहते हैं कि “हम बंगाली हैं'- अर्थात् मुसलमान, क्रिस्तान, बर्मी आदि नहीं हैं- बंगाली हिन्दू हैं। आपस में विवाहादि, आदान-प्रदान, स्वच्छन्दता से होता है- केवल 'बंगाली' होना ही यथेष्ट है, और चटगाँव के किसी बंगाली ब्राह्मण द्वारा मन्त्र पढ़ाकर दोनों के हाथ मिलाकर एक कर दिया जाना ही बस है। विधवा हो जाने पर विधवा-विवाह का रिवाज नहीं है- सो शायद इसलिए कि पुरोहित मन्त्र पढ़ने को राजी नहीं होता। परन्तु वैधव्य भी ये पसन्द नहीं करतीं और फिर एक नयी गृहस्थी बना लेती हैं। उनके लड़के-बच्चे होते हैं और वे भी कहते हैं कि 'हम बंगाली हैं', तथा उनके विवाह में वही पुरोहित आकर वैदिक मन्त्र पढ़ाकर विवाह करा जाते हैं- इस दफे उन्हें तिल-भर भी आपत्ति नहीं होती। पति के द्वारा अत्यन्त दु:ख-यन्त्रणा पाने पर ये दूसरे का आश्रय भी ग्रहण करती हैं जरूर, किन्तु, यह अत्यन्त लज्जा की बात समझी जाती है और इसके लिए दु:ख-यन्त्रणा का परिमाण भी अत्यधिक होना चाहिए। परन्तु फिर भी, ये वास्तव में हिन्दू हैं और दुर्गा-पूजा से शुरू करके षष्टी महाकाली आदि कोई भी पूजा नहीं छोड़तीं।
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