|
उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
|
337 पाठक हैं |
||||||||
शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
7
रास्ते में जिन लोगों के सुख-दु:ख में हिस्सा बँटाता हुआ मैं इस परदेश में आकर उपस्थित हुआ था, घटना-चक्र से वे तो रह गये शहर के एक छोर पर और मुझे आश्रय मिला शहर के दूसरे छोर पर। इसलिए, इन पन्द्रह-सोलह दिनों के बीच उस ओर जा न सका। इसके सिवाय, सारे दिन नौकरी की उम्मीदवारी में घूमते इतना थक जाता था कि शाम के कुछ पहले वास-स्थान पर लौटने पर इतनी शक्ति ही नहीं बचती थी कि मैं कहीं भी बाहर जाऊँ। क्रम-से-क्रम जैसे-जैसे दिन बीतने लगे मेरे मन में यह धारणा होने लगी कि इस सुदूर परदेश में आने पर भी नौकरी प्राप्त करना मेरे लिए ठीक उतना ही कठिन है जितना कि देश में था।
अभया की बात याद आई। जिस आदमी पर भरोसा करके वह घर छोड़कर अपना पति खोजने आई है, पता न लगने पर उस आदमी का क्या हाल होगा। घर छोड़कर बाहर आने का मार्ग काफी खुला होने पर भी लौटने का मार्ग ठीक उतना ही प्रशस्त बना रहेगा, इतनी बड़ी आशा की कल्पना करने का साहस बंगाल देश की आबो-हवा में पले होने के कारण मुझमें नहीं है। उन्होंने अधिक दिनों तक अपना निर्वाह कर सकने लायक धन-बल संग्रह करके पैर नहीं बढ़ाया है, इसका अनुमान करना भी मेरे लिए कठिन नहीं है। बाकी बचा केवल एक रास्ता जो कि पन्द्रह आने बंगालियों का एकमात्र सहारा है-अर्थात् महीने-पन्द्रह दिन के बाद पराई नौकरी करके मरण-पर्यन्त किसी तरह शरीर में हाड़-मांस बनाए रहकर जीते रहना। यह कहने की जरूरत नहीं कि रोहिणी बाबू के लिए भी इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं था, किन्तु, रंगून के इस बाजार में केवल अपना ही पेट भरने लायक नौकरी जुटाने में जब मेरा यह हाल है तब एक स्त्री को अपने कन्धों पर लादे हुए अभया के उस बेचारे बिना ढंग-ढौल के गुमसुम 'भइया' का क्या हाल होगा इसकी कल्पना करके मैं भयभीत हो उठा। मैंने स्थिर किया कि जैसे बने, कल एक दफे जाकर उनकी खबर जरूर लूँगा।
दूसरे दिन शाम के समय करीब दो कोस जमीन खोदकर उनके वास-स्थान पर पहुँचा और देखा कि बाहर के बरामदे में एक छोटे-से मोढ़े पर रोहिणी भइया बैठे हुए हैं। उनका मुख-मण्डल बादल छाए हुए 'आषाढस्य प्रथम दिवसे' की तरह गुरु-गम्भीर हो रहा है। बोले, “ओह श्रीकान्त बाबू! आप अच्छे तो हैं?”
|
|||||

i 









