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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
मैं बोला, “जी, अच्छा ही हूँ।”
“जाइए, भीतर जाकर बैठिए।”
मैंने डरते हुए पूछा, “आप लोग तो सब अच्छे हैं?”
“हूँ- भीतर जाइए न, वे घर में ही हैं।”
“अच्छा जाता हूँ- आप भी आइए न?”
“नहीं, मैं यहीं पर कुछ देर आराम करूँगा। परिश्रम करते-करते एक तरह से मेरी हत्या ही हुई जाती है- दो घड़ी पैर फैलाकर कुछ बैठ ही लूँ।” वे परिश्रम की अधिकता से मरे हुए से हो गये हैं उनके चेहरे पर से यह प्रकाशित न होते हुए भी मैं मन ही मन कुछ उद्विग्न हो उठा। रोहिणी भइया के भीतर भी इतनी गम्भीरता इतने दिन से प्रच्छन्न रूप में वास कर रही है, अपनी आँखों देखे बिना यह विश्वास करना कठिन था। किन्तु मामला क्या है? मैं खुद भी तो रास्ते-रास्ते की धूल छानकर ऊब उठा हूँ। मेरे यह रोहिणी भइया भी क्या-
किवाड़ों की आड़ में से अभया ने अपना हँसता हुआ चेहरा बाहर निकालकर गुपचुप इशारा करके मुझे भीतर बुलाया। दुविधा में पड़कर मैंने कहा, “चलिए न रोहिणी भइया, भीतर चलकर गप-शप करें।”
रोहिणी भइया ने जवाब दिया, “गप-शप! इस समय मर जाऊँ तो जान बचे, यह जानते हो श्रीकान्त बाबू?”
“नहीं जानता”, यह मुझे स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने जवाब में केवल एक प्रचण्ड उसास छोड़ी और कहा, “दो दिन बाद ही मालूम हो जायेगा।”
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