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उपन्यास >> श्रीकान्त

श्रीकान्त

शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय

प्रकाशक : भारतीय साहित्य संग्रह प्रकाशित वर्ष : 2016
पृष्ठ :598
मुखपृष्ठ : ईपुस्तक
पुस्तक क्रमांक : 9719
आईएसबीएन :9781613014479

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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास


गुरुदेव ने मेरे सिर पर पुन: अपना हाथ रखकर कहा, 'इस बात को किसी दिन भी मत भूलना बेटी। जो अपराध एक आदमी को मिट्टी में मिला देता है, उसी अपराध में से दूसरा आदमी स्वच्छन्दता से पार हो जाता है। इसलिए सारे विधि-निषेध सभी को एक डोरी में नहीं बाँध सकते।”'

संकोच के साथ मैंने धीरे से पूछा, 'जो अन्याय है, जो अधर्म है, वह क्या सबल और दुर्बल दोनों के निकट समान रूप से अन्याय-अधर्म नहीं है? यदि नहीं है, तो यह क्या अविचार नहीं है?”

गुरुदेव बोले, “नहीं बेटी, बाहर से चाहे जैसा दीखे, उनका फल समान नहीं है। यदि ऐसा होता तो संसार में सबल-दुर्बल में कोई अधिक भेद ही नहीं रहता। जो विष पाँच वर्ष के बच्चे के लिए घातक है, वही विष यदि इकतीस वर्ष के मनुष्य को न मार सके तो दोष किसे दोगी बेटी? किन्तु, यदि आज तुम मेरी बात पूरी तरह न समझ सको, तो, कम-से-कम इतना जरूर याद रखना कि जिन लोगों के भीतर आग जल रही है और जिनमें केवल राख ही इकट्ठी होकर रह गयी है- उनके कर्मों का वजन एक ही बाट से नहीं किया जा सकता। यदि किया जाए, तो गलती होगी।”

श्रीकान्त भइया, तुम्हारी चिट्ठी पढ़कर आज मुझे अपने गुरुदेव की वही भीतर की आग वाली बात याद आ रही है। अभया को नजर से देखा नहीं है, फिर भी ऐसा लगता है कि उनके भीतर जो आग जल रही है उसकी ज्वाला का आभास चिट्ठी के भीतर से भी जैसे मैं पा रही हूँ। उनके कर्मों का विचार जरा सावधानी से करना। मेरे जैसी साधारण स्त्री के बटखरे लेकर उनके पाप-पुण्य का वजन करने न बैठ जाना।”

चिट्ठी को अभया के हाथ में देकर कहा, “राजलक्ष्मी ने तुम्हें शत-सहस्र नमस्कार लिखा है, यह लो।”

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