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उपन्यास >> श्रीकान्त श्रीकान्तशरत चन्द्र चट्टोपाध्याय
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शरतचन्द्र का आत्मकथात्मक उपन्यास
अभया, जो कुछ लिखा था उसे दो-तीन बार पढ़कर और किसी तरह पत्र को मेरे बिछौने पर डालकर, तेजी से बाहर चली गयी। दुनिया की नजरों में उसका जो नारीत्व आज लांछित और अपमानित हो रहा है, उसी के ऊपर शत योजन दूर से एक अपरिचिता नारी ने सम्मान की पुष्पांजलि अर्पण की है, उसी की अपरिसीमा आनन्द-वेदना को वह एक पुरुष की दृष्टि से बचाकर चटपट आड़ में ले गयी।
करीब आधा घण्टे बाद अभया अच्छी तरह मुँह-आँखें धोकर लौट आई और बोली, “श्रीकान्त भइया...”
मैंने रोककर कहा, “अरे यह क्या! 'भइया' कब से हो गया?”
“आज से ही।”
“नहीं नहीं, 'भइया' नहीं। तुम सब लोग मिलकर सभी ओर से मेरा रास्ता बन्द न कर देना!”
अभया ने हँसकर कहा, “मालूम होता है, मन ही मन कोई मतलब गाँठ रहे हो, क्यों?”
“क्यों, क्या मैं आदमी नहीं हूँ?”
अभया बोली, “बेढब आदमी दीखते हो। बेचारे रोहिणी बाबू ने बीमारी के समय आसरा दिया; अब चंगे होकर, जान पड़ता है, उन्हें यही पुरस्कार देना निश्चय किया है। किन्तु, मेरी बड़ी भूल हो गयी। उस समय बीमारी का एक तार दे देती, तो आज उन्हें देख लेती।”
मैंने गर्दन हिलाकर कहा, “आश्चर्य नहीं कि वह आ जाती।”
अभया क्षण-भर स्थिर रहकर बोली, “तुम एकाध महीने की छुट्टी लेकर एक बार चले जाओ, श्रीकान्त भइया। मुझे जान पड़ता है, तुम्हारी उन्हें बड़ी जरूरत हो रही है।”
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